Ram Rahim Parole Controversy: आमतौर पर जघन्य अपराधों के दोषी ठहराए गए कैदियों के प्रति गैरजरूरी और एक सीमा से ज्यादा नरमी बरतना न्याय की अवधारणा के अनुकूल नहीं माना जाता है। मगर हत्या और बलात्कार के अपराध में दोषी ठहराए जाने के बावजूद किसी खास सजायाफ्ता कैदी के प्रति सरकार का रुख जब जरूरत से ज्यादा उदार दिखने लगे, तो स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि आखिर कानून और सजा का मतलब क्या रह गया!
गौरतलब है कि बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध में दोषी साबित होने के बाद जेल में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को एक बार फिर चालीस दिनों की पैरोल मिल गई। भले ही इस छूट के लिए सरकार की ओर से पेश दलीलों पर तमाम सवाल उठ रहे हों, लेकिन राम रहीम अगले चालीस दिनों तक जेल के बाहर रहेगा।
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दरअसल, अदालत में इस पैरोल मिलने के मसले पर हरियाणा सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि वह कोई ‘पेशेवर अपराधी’ नहीं है और जेल में ‘अच्छे चाल-चलन’ वाला कैदी है। सवाल है कि जिस कसौटी पर सरकार ने राम रहीम के प्रति लगातार उदारता दिखाई है, क्या वह यही पैमाना जेल में बंद जघन्य अपराधों के अन्य दोषियों के प्रति भी लागू करती है।
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दो डेरा साध्वियों से बलात्कार के मामले के अलावा राम रहीम को हत्या के अन्य मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है। मगर सजा काटने के लिए जेल में जाने से लेकर अब तक उसे पंद्रहवीं बार ‘पैरोल’ या फिर ‘फरलो’ पर बाहर आने की सुविधा मुहैया कराई गई है। अब तक वह कुल चार सौ दिन से ज्यादा वक्त तक जेल से बाहर रह चुका है।
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जघन्य अपराधों के दोषियों को लेकर कोई सरकार शायद ही कभी इस हद तक उदार होती है। सही है कि पैरोल एक कानूनी व्यवस्था है और इसके तहत कैदी को शर्तों के साथ जेल से कुछ दिनों के लिए रिहा किया जाता है, लेकिन इस कानूनी प्रावधान का बेजा इस्तेमाल न्याय की अवधारणा पर चोट पहुंचाने से अलग नहीं है।
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सरकार को इस बात से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे कानूनों की मनमानी व्याख्या और पीड़ितों के प्रति न्याय की अवधारणा को चोट पहुंचाने को लेकर कैसे उदाहरण बन रहे हैं!
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