मणिपुर में चार महीने पहले शुरू हुई हिंसा आज भी अगर नहीं थम सकी है और अराजकता में लिप्त गुटों पर काबू नहीं पाया जा सका है तो इसे राज्य सरकार की नाकामी के तौर पर ही देखा जाएगा। राज्य में शांति स्थापित करने की घोषणाओं और तमाम कवायदों के बरक्स हकीकत यह है कि आज भी वहां हिंसा से प्रभावित इलाकों में पीड़ित लोगों के लिए जरूरी राहत की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अगर किसी एक समूह के प्रभाव वाले इलाके में दूसरे पक्ष के कुछ लोग बचे हुए थे, तो हिंसक समूहों से उनको सुरक्षा मुहैया कराने के बजाय हल यह तलाशा जा रहा है कि उन्हें वहां से दूसरे क्षेत्र में भेज दिया जाए।

इंफल में कुकी-जोमी समुदाय के आखिरी बचे चौबीस लोगों को हटाया गया

गौरतलब है कि शनिवार की रात इंफल में कुकी-जोमी समुदाय के आखिरी बचे हुए चौबीस लोगों को अचानक ही पुलिस ने घरों से निकाल कर दूसरे इलाके में स्थिति पहाड़ों के बीच पहुंचा दिया। खबरों के मुताबिक, वहां से हटाए गए लोगों का कहना था कि पुलिस ने उन्हें अपना कोई छोटा-मोटा सामान भी नहीं लेने दिया। जिन परिवारों को वहां से हटाया गया, उन्हें इंफल से सत्ताईस किलोमीटर दूर कांगपोकपी के मोटबुंग में ले जाया गया। वहां असम राइफल्स के राहत शिविर हैं। साथ ही वहां फिलहाल हिंसा से प्रभावित कुकी और दूसरे आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं।

छोटे से राज्य में चार महीने से जारी हिंसा पर सरकार का नियंत्रण नहीं

यह माना जा सकता है कि इंफल में बचे हुए जिन आखिरी चौबीस लोगों को पुलिस ने वहां से हटाया, उसका मकसद उन्हें खतरे से बचाना था। सवाल है कि एक छोटे-से राज्य में चार महीने से चल रही हिंसक घटनाओं और इसे अंजाम देने वाले समूहों पर काबू पाना आज भी सरकार के लिए मुश्किल क्यों बना हुआ है! इंफल में न्यू लेम्बुलेन के जिस इलाके से कुकी समुदाय के लोगों को हटाया गया, वह मुख्यमंत्री के आवास से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और पुलिस मुख्यालय के करीब है।

इसी वजह से वहां प्रतिरोधी गुटों के हमले कम हुए थे। उस इलाके में कुकी समुदाय के करीब तीन सौ परिवार रहते थे, लेकिन हमले की आशंका से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर गए। उनमें से पांच परिवारों ने वहीं रुकने का फैसला किया। सवाल है कि राज्य में सबसे उच्च स्तर वाले सुरक्षित इलाके से भी अगर कुछ लोगों को हिंसा के डर से पलायन करना पड़ा तो क्या यह अपने आप में सरकार की ओर से की गई सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान नहीं है?

जाहिर है, कुकी समुदाय के जो लोग वहां रुक गए थे, वे सरकार और पुलिस पर भरोसे की वजह से ऐसा कर सके। लेकिन सच यह है कि उस इलाके में कुकी समुदाय के बचे हुए आखिरी कुछ लोगों को भी सुरक्षा मुहैया कराने के बजाय उन्हें बचाने की दलील पर वहां से दूसरे इलाके में भेज दिया गया। राज्य में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के सवाल पर शुरू हुई में हिंसा के चार महीने के बाद भी आखिरी उम्मीद टकराव में शामिल गुटों के बीच संवाद स्थापित करना ही है। लेकिन इस दिशा में शांति के लिए की गई कवायदों का अब तक कोई खास नतीजा नहीं निकल सका है।

हालत यह है कि अब भी जारी हिंसा में लोगों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं। यह तब है जब सुप्रीम कोर्ट भी इस मसले पर सख्त नाराजगी जता चुका है। अफसोस की बात यह है कि सरकार की घोषणाओं के समांतर पुलिस और सेना की कार्रवाइयों के बावजूद मणिपुर में हल का कोई ठोस रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है।