अस्पतालों में मरीज का इलाज ही नहीं, बल्कि चिकित्सकों और प्रबंधकीय कर्मियों का व्यवहार भी कई मायनों में महत्त्वपूर्ण होता है। किसी बीमारी से पीड़ित या हादसे में घायल व्यक्ति को इस उम्मीद के साथ अस्पताल लाया जाता है कि उसकी जान पर मंडरा रहा खतरा टल जाएगा। मगर इलाज के दौरान अगर किसी की मौत हो जाए, तो अस्पताल प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी मरीज के शव को ससम्मान परिजनों को सौंप देने की होती है।
इसके बावजूद अगर कोई अस्पताल इलाज के खर्च का भारी-भरकम बिल बनाकर उसकी पूरी वसूली के लिए शव को अपने कब्जे में रखने का प्रयास करे, तो इसे संवदेनहीनता और अनैतिकता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहा जाएगा! उत्तराखंड के हल्द्वानी में हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया। एक निजी अस्पताल ने महिला को उसकी मौत से पहले केवल दो घंटे भर्ती करने का न केवल अस्सी हजार रुपए का बिल बना दिया, बल्कि इसका पूरा भुगतान न होने पर परिजनों को शव सौंपने से भी इनकार कर दिया। बाद में पुलिस के दखल देने पर शव परिजनों के हवाले किया गया।
इसमें दोराय नहीं है कि निजी अस्पताल अब मानवता की सेवा के बजाय उद्योग-धंधे में तब्दील होते जा रहे हैं, जहां मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति मानवीय संवेदनाओं और सेवा भाव पर हावी होती दिख रही है। यही वजह है कि निजी अस्पतालों में इलाज की बड़ी रकम का पूरा भुगतान न करने पर शव परिजनों को सौंपने से इनकार कर देने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।
ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि क्या अस्पतालों के इस रवैये को कानूनी या मानवीय तौर पर जायज ठहराया जा सकता है? हल्द्वानी के मामले में तो परिजनों ने बिल के अस्सी हजार रुपए में से सत्तावन हजार रुपए का भुगतान कर दिया था, इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने महिला का शव देने से इनकार दिया। अगर कोई मरीज या उसके परिजन इलाज के खर्चे की जायज रकम देने से इनकार करता है, तो अस्पताल प्रशासन कानून का सहरा ले सकता है, लेकिन शव को अपने कब्जे में लेने के प्रयास को न तो कानूनी और न ही नैतिक तौर पर उचित ठहराया जा सकता है।
