इच्छामृत्यु या दयामृत्यु के पक्ष में शुक्रवार को आया सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक भी है और दूरगामी महत्त्व का भी। इस फैसले नेएक प्रकार से गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार पर मुहर लगाई है। हमारे संविधान के अनुच्छेद इक्कीस ने जीने के अधिकार की गारंटी दे रखी है। लेकिन जीने का अर्थ गरिमापूर्ण ढंग से जीना होता है। और, जब यह संभव न रह जाए, तो मृत्य के वरण की अनुमति दी जा सकती है। गौरतलब है कि ताजा फैसला सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनाया है, जिसके मुताबिक दयामृत्यु की इजाजत कुछ विशेष परिस्थितियों में दी जा सकती है। इजाजत के लिए अदालत ने उचित ही कई कठोर शर्तें लगाई हैं और कहा है कि जब तक इस संबंध में संसद से पारित होकर कानून लागू नहीं हो जाता, तब तक ये दिशा-निर्देश लागू रहेंगे। यह मुद््दा तब देश भर में बहस का विषय बना था जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दयामृत्यु के लिए याचिका दायर की गई थी। बलात्कार और हत्या के प्रयास की शिकार अरुणा चालीस साल तक एक अस्पताल में बेहोशी की हालत में रहीं। उन्हें सामान्य अवस्था में ला सकने की सारी कोशिशें निष्फल हो चुकी थीं।

एक शख्स जो न अपने परिजनों को पहचान सकता है, न चल-फिर, न खा-पी सकता है, न सुन-बोल सकता है, जिसे अपने अस्तित्व का भी बोध नहीं है, और जिसे तमाम चिकित्सीय उपायों से स्वस्थ करना तो दूर, होश में भी नहीं ला सकते, उसका जीना एक जिंदा लाश की तरह ही होता है। ऐसी स्थिति में उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी जीवनरक्षक प्रणाली के सहारे केवल टिकाए रखना मरीज के लिए भी यातनादायी होता है और उसके परिजनों के लिए भी। यह तर्क सर्वोच्च न्यायालय को तब भी जंचा था, पर तब उसने याचिका खारिज कर दी थी। अब उसने दयामृत्यु की इजाजत दे दी है, पर सख्त दिशा-निर्देश के साथ। निर्देशों के मुताबिक, ऐसा मरीज जिसकी हालत बुरी तरह लगातार बिगड़ती जा रही हो या जो अंतिम रूप से लाइलाज हो चुका हो, दयामृत्यु को चुन सकता है। इस संबंध में उसे एक लिखित इच्छापत्र या वसीयत देनी होगी। पर इसे काफी नहीं माना जाएगा। इसे लेकर मरीज के परिजनों या मित्रों को उच्च न्यायालय की शरण में जाना होगा। न्यायालय के निर्देश पर एक मेडिकल बोर्ड गठित किया जाएगा, और वह बोर्ड ही तय करेगा कि मरीज चिकित्सीय रूप से दयामृत्यु का हकदार है या नहीं।

अगर मरीज पहले से निरंतर बेहोशी की हालत में हो, तब भी परिजनों को उच्च न्यायालय की अनुमति से बाकी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। अस्पताल को भी, जीवनरक्षक प्रणाली हटाने से पहले यह देखना होगा कि सारी शर्तें पूरी कर ली गई हैं या नहीं। इस तरह अदालत ने किसी भी मरीज को यह अधिकार दिया है कि वह चाहे तो, लगातार बेहोशी की हालत में रखे जाने या लगातार कृत्रिम उपायों के सहारे अपना वजूद बनाए रखने से इनकार कर सकता है। दयामृत्यु का अधिकार कई देशों में है और इसे मानव सभ्यता की प्रगति की एक निशानी के तौर पर ही देखा जाता रहा है। भारत में विभिन्न मानव अंगों के दान से संबंधित कानून हैं, और ये कानून यही जताते हैं कि हर व्यक्ति का अपने शरीर पर अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने भी इसी की पुष्टि की है। अब इस संबंध में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है, और केंद्र सरकार को इस बारे में पहल करनी चाहिए।