यों तो आतंकवाद के मद्देनजर पाकिस्तान खुद जब-तब कठघरे में खड़ा दिखता है, पर विडंबना यह है कि इन दिनों वही आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित नजर आ रहा है। हफ्ते भर के भीतर वहां एक के बाद एक कई आतंकी हमले हो चुके हैं और इन घटनाओं के निशाने पर सेना के जवान, पुलिसकर्मी, जज, पत्रकार और स्त्रियों व बच्चों समेत सभी तबकों के लोग रहे हैं। भौगोलिक दृष्टि से भी इन वारदातों का दायरा व्यापक है, पाकिस्तान के सभी प्रांतों में ये हमले हुए हैं। इस सिलसिले की सबसे ताजा कड़ी सबसे भयावह भी है। गुरुवार को सिंध प्रांत के सहवान कस्बे में स्थित लाल शाहबाज कलंदर दरगाह के भीतर एक आत्मघाती हमलावर द्वारा किए गए विस्फोट में करीब सौ लोगों की मौत हो गई और डेढ़ सौ लोग घायल हो गए। यह धमाका सूफी रस्म ‘धमाल’ के दौरान हुआ, जब दरगाह परिसर में सैकड़ों की तादाद में जायरीन मौजूद थे। हमले के पीछे किसका हाथ होगा, इसके बारे में शायद अब तक तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही होतीं, अगर आइएस (इस्लामिक एस्टेट) ने बयान जारी कर इस हमले की जिम्मेदारी न ली होती।
हमले के स्थान और वक्त का चुनाव आइएस ने शिया और सुन्नी समुदायों के बीच तनाव पैदा करने के इरादे से ही किया होगा। शायद यह जताने की भी मंशा रही होगी कि वह दुनिया के किसी भी कोने में कहर बरपा सकता है। आइएस का सीरिया और इराक के कुछ-कुछ हिस्सों पर कब्जा है, पर उसका आतंक वहीं तक सीमित नहीं है। दुनिया में जहां से भी संभव हो, वह लड़ाकों और अपने शरीर पर बम बांध कर मरने-मारने के लिए तैयार नौजवानों की तलाश में रहता है। कुछ वर्षों से सबसे ज्यादा पश्चिमी देश आइएस को लेकर दहशत में रहे हैं। पर इस्लामी या मुसलिम बहुल मुल्कों को भी आइएस ने बख्शा नहीं है। इस संदर्भ में पाकिस्तान से पहले हम तुर्की और बांग्लादेश में हुए उसके हमलों को याद कर सकते हैं। यह भी गौरतलब है कि जिस दिन सिंध प्रांत के सहवान में हुए फिदायीन हमले ने पाकिस्तान को दहला दिया, उसी दिन बगदाद में भी एक कार-बम विस्फोट ने पैंतालीस लोगों की जान ले ली, और इस वारदात के बाद आइएस की सूचना या प्रचार एजेंसी ने विस्फोट की खबर देते हुए कहा कि ‘शिया लोगों की भीड़’ को निशाना बनाया गया। जहां तक पाकिस्तान की बात है, वहां आइएस के सक्रिय होने से पहले भी शियाओं पर कई बार आतंकी हमले हुए थे। 2005 से वहां पच्चीस से अधिक दरगाहों पर हमले हो चुके हैं। यानी शिया-सुन्नी टकराव की खूनी कोशिशें पहले भी होती रही थीं, और अब हो सकता है कि वैसे उन्मादी तत्त्वों ने आइएस का दामन थाम लिया हो।
बहरहाल, ताजा हमले ने स्वाभाविक ही पूरे पाकिस्तान को स्तब्ध कर दिया है, और यह अच्छी बात है कि वहां सेना से लेकर सरकार और समाज तक, सब तरफ आतंकवाद के खिलाफ सख्ती बरतने की जरूरत का अहसास दिख रहा है। आतंकी हमले को चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि पाक सुरक्षा बलों ने देश के विभिन्न स्थानों पर की गई कार्रवाई में सैंतीस आतंकियों को मार गिराने का दावा किया है। अफगानिस्तान से लगी सीमा भी फिलहाल सील कर दी गई है। पर सवाल है कि इतने कम समय में, सेना ने इतनी ज्यादा जगहों पर मुठभेड़ कैसे की? क्या उसे वे सारे ठिकाने पता थे, और सबकुछ जानते हुए भी खामोशी बरती जा रही थी? पाकिस्तान कहता रहा है कि वह खुद आतंकवाद से पीड़ित है। ताजा हमले से भी जाहिर है कि यह तथ्य अपनी जगह सही है। पर पाकिस्तान आतंकवाद का एक बड़ा अड््डा भी है। इसे नेस्तनाबूद करने की जिम्मेवारी किसकी है!

