आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान का सुर इन दिनों कुछ बदला हुआ नजर आ रहा है। जमात-उद-दावा प्रमुख हाफिज सईद को लेकर एक बार फिर वहां की सरकार ने सख्त टिप्पणी की है। पिछले महीने के आखिरी हफ्ते में हाफिज सईद और उसके संगठनों से जुड़े कुछ लोगों को नब्बे दिन के लिए नजरबंद कर दिया गया। अब उसके दो संगठनों जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत के सदस्यों के नाम जारी चौवालीस हथियारों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं। उधर जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन में पाकिस्तान के रक्षामंत्री ने कहा कि हाफिज सईद समाज के लिए गंभीर खतरा पेश कर सकता है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों के दौरान पाकिस्तान में हुए आतंकी हमलों के मद्देनजर हाफिज सईद और उसके संगठनों से जुड़े सैंतीस लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान सरकार हाफिज सईद को आतंकवादी मानती है। मगर सवाल है कि फिलहाल उसे जिस तरह नजरबंदी में रखा गया है, क्या इतने भर से उसकी गतिविधियों पर रोक लगने का भरोसा किया जा सकता है।
इससे पहले भी 2008 में मुंबई हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में हाफिज सईद को नजरबंद किया गया था। मगर कुछ समय बाद वहां की एक अदालत ने उसे मुक्त कर दिया। ऐसे में जब भी भारत की ओर से मुंबई हमलों को लेकर हाफिज सईद के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश करता रहा है, पाकिस्तान सरकार उसे आतंकवादी के बजाय समाज सेवक बता कर उसका बचाव करती रही है। मगर अब वही उसे समाज के लिए खतरनाक मान रही है, तो इसकी कुछ वजहें जाहिर हैं। आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए उस पर काफी समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव बनता आ रहा है। भारत के कूटनीतिक फैसलों से वह अलग-थलग पड़ता रहा है। फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पदभार संभालते ही जिस तरह कुछ मुसलिम देशों के खिलाफ कड़े कदम उठाने का एलान किया, उसका भी असर पड़ा। आतंकवाद को लेकर उनके रुख से पाकिस्तान को कुछ भय पैदा हुआ होगा। बेशक अब उसके कंधे पर बेशक चीन का हाथ हो, पर अमेरिका की नाराजगी वह बहुत देर तक झेल नहीं पाएगा।
पाकिस्तानी रक्षामंत्री ने हाफिज सईद के बारे में तल्ख टिप्पणी के लिए जर्मनी के म्यूनिख में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन का मंच चुना तो यह उनकी सोची-समझी रणनीति थी। वहां से वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संदेश देना चाहते थे कि आतंकवाद से लड़ने के मामले में किसी भी रूप में पीछे नहीं हैं। इसके लिए उन्होंने दलील भी दी कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश करेगा, तो उससे आतंकवाद को रोकने में कामयाबी मिलने के बजाय उसके बढ़ने का अंदेशा अधिक रहेगा। मगर पाकिस्तानी रक्षामंत्री की ताजा टिप्पणी में कितनी गंभीरता है और वह कितनी स्थायी है, दावा करना मुश्किल है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का दबाव बना है, पाकिस्तान अपने यहां के कुछ कट्टरपंथी नेताओं और आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों को नजरबंद कर यह दिखाने का प्रयास करता रहा है कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल है। मगर मौका मिलते ही, किसी न किसी बहाने प्रतिबंधित संगठनों के नेताओं को स्वतंत्र छोड़ देता है। जबकि पाकिस्तान खुद आतंकवाद के चलते काफी परेशानियां झेल रहा है। अगर सचमुच वह आतंकवाद से निपटना चाहता है, तो उसे ऐसी छोटी-मोटी दिखावटी कार्रवाइयों के बजाय कोई कठोर कदम उठाने पर विचार करना चाहिए।
