दिल्ली निवासी और एक बेटी की मां उज्मा अहमद की पाकिस्तान से वापसी की कहानी में यों तो कई नाटकीय और दुखद मोड़ हैं, लेकिन अच्छी बात यही है कि इसका अंत सुखद रहा। इसके लिए विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और पाक स्थित भारतीय उच्चायोग की कोशिशें सचमुच प्रशंसा की हकदार हैं। इस घटना का एक बड़ा सबक यह भी है कि आज के दौर में इंटरनेट या सोशल मीडिया के जरिए होने वाली दोस्तियों के मामले में अत्यधिक सजग रहने की जरूरत है। पीड़िता का कटु अनुभव दरअसल सोशल मीडिया में पहचान छिपा कर बैठे दरिंदों के चेहरे से नकाब उतारता है। हुआ यों कि बीते अप्रैल में उज्मा की जान-पहचान इंटरनेट के जरिए पाकिस्तानी नागरिक ताहिर से हुई। दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई तो ताहिर ने उज्मा को मलेशिया में नौकरी दिलाने का झांसा दिया। कहना चाहिए कि उज्मा के साथ धोखाधड़ी की शुरुआत यहीं से हुई।

कायदे से उज्मा को ताहिर पर इतनी जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए था। ताहिर के बुलावे पर जब उज्मा मलेशिया पहुंची तब यह राज खुला कि वह वहां टैक्सी ड्राइवर है। इसके बाद वह भारत आ गई। एक मई को उज्मा अपने कुछ रिश्तेदारों से मिलने पाकिस्तान गई तो ताहिर फिर उसके संपर्क में आया। जैसा कि उज्मा का आरोप है, ताहिर ने उसे धोखे से नींद की गोली खिला दी और कबीलाई इलाके खैबर पख्तूनख्वा में ले जाकर बंदूक के बल पर निकाहनामे पर दस्तखत करा लिया। वहां उसे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित भी किया। ताहिर ने उसे यह धमकी भी दी कि अगर कोई चालाकी करने की कोशिश की तो दिल्ली स्थित उसकी बेटी का वह अपहरण करा लेगा। ऐसे नाजुक वक्त में जब किसी का भी धीरज टूट जाता, उज्मा ने थोड़ी समझदारी से काम लिया और ताहिर को लेकर भारतीय उच्चायोग पहुंच गई, जहां उसे न सिर्फ पनाह मिली, बल्कि स्वदेश वापसी की राह भी आसान हुई।

विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के विशेष रुचि लेने से राजनयिक स्तर की कई बाधाएं कम वक्त में पार हुर्इं। लेकिन दुश्वारियां अभी और भी थीं। कहां तो पाक सरकार को ताहिर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना चाहिए था और कहां खुद ताहिर ने ही उज्मा के खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखा दी और मामला इस्लामाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा। ताहिर ने मामले को भारत-पाकिस्तान के संदर्भ से जोड़ने की भी कोशिश की और अदालत में दलील दी कि यह अपने मुल्क की इज्जत का सवाल है। इस पर न्यायमूर्ति अख्तर कयानी ने उचित ही ताहिर को फटकार लगाई और कहा कि यह हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मसला नहीं है, बल्कि एक लड़की की इंसाफ की मांग का मामला है। आखिर अदालत ने पाक सरकार को हुक्म दिया कि उज्मा को अपने वतन जाने के लिए वाघा सीमा तक सकुशल पहुंचाया जाए। लौटने के बाद उज्मा का स्वदेश में जोरदार स्वागत हुआ। उसने पाकिस्तान को मौत का कुआं कह कर एक तरह से अपने साथ घटी त्रासदी ही बयान की है। पाकिस्तान की पुलिस को चाहिए कि वह ताहिर को गिरफ्तार करेऔर उसके खिलाफ मुकदमा चलाए। उज्मा हालांकि ताहिर के चंगुल के निकल आई है, पर पूरा इंसाफ तभी होगा जब ताहिर को अपने किए की सजा भी मिले।