उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। दुनिया के बहुत सारे देशों की आबादी उत्तर प्रदेश से कम है। लेकिन इतने बड़े राज्य की जनता की बुनियादी समस्याओं से राजनीतिक दलों का कितना सरोकार है, इसका अंदाजा अगली विधानसभा के लिए उनकी चुनावी कवायद से लगाया जा सकता है। चुनाव संभवत: अगले साल फरवरी या मार्च में होंगे। लेकिन अभी से रामधुन शुरू हो गई है। यह असल में चुनावी धुन है। उत्तर प्रदेश का चुनाव नजदीक आते ही भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर राम याद हो आए हैं। पर इस बार राम का सहारा लेने में वह अकेली नहीं है। एक तरफ केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री महेश शर्मा रामायण संग्रहालय के निर्माण के लिए जमीन चिह्नित करने की खातिर अयोध्या जा पहुंचे, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अयोध्या में रामलीला सेंटर या थीम पार्क के निर्माण का एलान किया है। दोनों पार्टियां भले यह दावा करें कि उनकी घोषणाएं संस्कृति और पर्यटन से वास्ता रखती हैं, पर सच तो यह है कि ये घोषणाएं चुनावी चिंता से प्रेरित हैं।
रामायण संग्रहालय के आश्वासन से कुछ पहले ही, भाजपा ने एक बार फिर राम का सहारा लेने के संकेत दे दिए थे, जब उसने दशहरे पर लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रख कर रैली का आयोजन किया, और इस रैली में मोदी ने कई बार जयश्रीराम का उद्घोष किया, जिसे पार्टी ने अयोध्या आंदोलन में एक नारे की तरह इस्तेमाल किया था। कांग्रेस अलबत्ता इस होड़ में पीछे है, पर पिछले दिनों राहुल गांधी अपनी किसान यात्रा के दौरान हनुमानगढ़ी में दर्शन करने पहुंचे, तो इसके पीछे सिर्फ आस्थागत प्रेरणा नहीं, शायद ‘हिंदू वोट’ की चिंता भी रही होगी। अलबत्ता बसपा इस होड़ से दूर नजर आती है। इसके दो कारण हो सकते हैं। एक यह कि उसे भरोसा होगा कि उसके परंपरागत जनाधार पर राम-राग से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरे, उसे लगता होगा कि इस होड़ से अलग दिखने के कारण नुकसान के बजाय अल्पसंख्यक वोटों के रूप में फायदा हो सकता है।
किसे लाभ होगा किसे नुकसान, यह तो बाद में पता चलेगा, मगर राजनीति और धर्म के इस घालमेल से न राजनीति का भला होगा, न धर्म का। उलटे, जन-सरोकार से जुड़े मुद््दों के नेपथ्य में चले जाने का खतरा है। सपा को उत्तर प्रदेश में शासन चलाते करीब पांच साल हो गए हैं, और भाजपा को केंद्र में ढाई साल। विडंबना यह है कि न सपा अपनी सरकार के कामकाज पर चुनाव लड़ना चाहती है न भाजपा को यह भरोसा है कि चुनाव जीतने के लिए मोदी के ढाई साल की दुहाई काफी होगी। हालांकि भाजपा मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने के बजाय मोदी को ही आगे करके विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती है, पर इसका कारण मोदी सरकार का कामकाज उतना नहीं है जितना ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का श्रेय लूटना और उसे चुनाव में भुनाना। पर यह तथ्य सामने आने के बाद कि इस तरह के ‘लक्षित हमले’ पहले भी हुए हैं, भाजपा एक और भावनात्मक मुद््दे को तूल देने में जुट गई है। उसे उम्मीद होगी कि इस तरह वह एक बार फिर, परोक्ष रूप से ही सही, अयोध्या मामले को भुना सकेगी, हालांकि पार्टी के ही कुछ लोगों की निगाह में यह राम मंदिर के वादे से ध्यान हटाने की कोशिश है। जो हो, उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अयोध्या-केंद्रित होना राज्य के भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा।
