आखिरकार ‘पनामा पेपर्स’ के खुलासे ने एक और प्रधानमंत्री को कुर्सी से विदा कर दिया। नवाज शरीफ से पहले आइसलैंड के प्रधानमंत्री को पद छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था, जिन पर आरोप था कि वे और उनकी पत्नी ने देश से बाहर की कंपनी में करोड़ों डॉलर के निवेश की जानकारी देश से छिपाई। इसी तरह पिछले साल अप्रैल में खुलासा हुआ था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के तीन बच्चों ने विदेश में कंपनियां खोलीं और इनके जरिए देश से बाहर बेशकीमती संपत्तियां जुटार्इं, पर यह तथ्य परिवार के संपत्ति-विवरण में शामिल नहीं किया गया। इससे स्वाभाविक ही आम धारणा यही बनी कि ये कंपनियां बनाने का मकसद अवैध रूप से संपत्ति जुटाना और कर की चोरी करना था। इससे नवाज शरीफ की साख को गहरी चोट पहुंची। यों भ्रष्टाचार का आरोप उनके लिए कोई नई बात नहीं थी, उन्नीस सौ अस्सी के दशक से उन पर ये आरोप लगते रहे हैं और ऐसे आरोपों के चलते एक बार उन्हें पहले भी पद छोड़ना पड़ा था।
पर यह पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट से आजीवन अयोग्य ठहराए जाने के कारण पाकिस्तान के किसी प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस मायने में यह एक अपूर्व घटना है। वरना पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास तो यही है कि अब तक कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।
नवाज शरीफ तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। पहले भी दोनों दफा कार्यकाल पूरा करने से पहले ही उनकी सरकार चली गई थी। इस बार उनका कार्यकाल पूरा होने में एक साल से भी कम समय बाकी था। पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
यह दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले उनके खिलाफ मामले की सुनवाई करने से मना कर दिया था। पर बाद में वह न सिर्फ सुनवाई के लिए राजी हो गया, बल्कि उसने खुद जांच समिति गठित की, जिसमें फौज की खुफिया एजेंसी के अफसर भी शामिल थे। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि फौज शरीफ से खफा थी और इसकी भी कीमत शरीफ को चुकानी पड़ी। जो हो, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने विपक्षी दलों का हौसला बढ़ाया है। संभव है कि अगले साल होने वाले संसदीय चुनाव में भ्रष्टाचार खास मुद््दा बने। इसकी सार्थक परिणति यही हो सकती है कि पाकिस्तान में अलग तरह के नेतृत्व की कतार उभरे।
नवाज शरीफ और उनका परिवार एक घातक मिश्रण के प्रतीक बन गए थे- राजनीति और सत्ता के साथ-साथ कारोबार में वर्चस्व तथा सही-गलत तरीकों से अपार धन जुटाने की हवस। ऐसे में अपने बारे में तथ्यों को छिपाना, पारदर्शिता की परवाह न करना और सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता जाता है। अगर पनामा पेपर्स का खुलासा न हुआ होता, तो क्या जाने कब तक सब कुछ पहले की ही तरह चलता रहता। यह इस बात का भी संकेत है कि सत्ता में बैठे लोग सारी जांच एजेंसियों को अपनी सुविधा के मुताबिक चलाते रहते हैं, वरना शरीफ परिवार का भांडा तो बहुत पहले फूट गया होता। पनामा पेपर्स के खुलासे का दायरा कई देशों तक फैला हुआ है और इसमें भारत भी शामिल है। भारत में उस खुलासे को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? बहुत-से लोग यह मान कर चलते हैं कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं बेहद कमजोर हैं। जबकि इस फैसले ने ऐसी धारणा में सुधार की जरूरत रेखांकित की है और खासकर वहां न्यायपालिका की मजबूती का संकेत दिया है।
