इस बात के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जब स्थानीय निकायों के चुनावों के नतीजे लोकसभा और विधानसभा चुनाव से भिन्न रहे हों। लेकिन यह भी सही है कि महाराष्ट्र में शहरी निकायों के चुनावों का महत्त्व दूसरे राज्यों के मुकाबले अधिक रहा है और इन पर काबिज होने का मतलब राज्य-स्तरीय राजनीति में भी ताकत बढ़ना है। गुरुवार को आए महाराष्ट्र के महानगर पालिका चुनावों के नतीजों से जाहिर है कि सबसे ज्यादा फायदे में भाजपा है और सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस व महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को हुआ है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को भी निराशा ही हाथ लगी है। सबसे ज्यादा नजरें बृहन्नमुंबई (बीएमसी) के चुनाव पर थीं। यहां शिवसेना पहले स्थान पर आई, और उससे कुछ ही कम सीटों के साथ भाजपा दूसरे नंबर पर। अलबत्ता शिवसेना 270 सदस्यीय बीएमसी में बहुमत के आंकड़े से काफी दूर है। 2012 में मिल कर लड़ने के बावजूद शिवसेना को सत्तर और भाजपा को इकतीस सीटें मिली थीं। पर इस बार अलग-अलग लड़ने के बावजूद दोनों की सीटों में भारी इजाफा हुआ है।
इस चुनाव का भाजपा बनाम शिवसेना हो जाना कांग्रेस और राकांपा के लिए बहुत बड़ा झटका है। बाकी नगर महापालिकाओं में भी भाजपा या तो बहुमत पाने में कामयाब हो गई या फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। पुणे की नगर महापालिका भाजपा ने राकांपा के हाथ से छीन ली, तो नाशिक की मनसे से। अगर पूरे महाराष्ट्र की सीटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा को मिली सीटों के आधे से भी कम सीटें शिवसेना को मिली हैं, शिवसेना के आधे से भी कम पर कांग्रेस है। यह उस राज्य में कांग्रेस का हाल है जो बहुत लंबे समय से उसका गढ़ रहा। 2004 में कांग्रेस केनेतृत्व में यूपीए की सरकार बन सकी तो इसके पीछे दो राज्यों में कांग्रेस को मिली कामयाबी का बड़ा हाथ था- एक, आंध्र प्रदेश, और दूसरा, महाराष्ट्र। इसके बाद के लोकसभा चुनाव यानी 2009 में भी इन्हीं दो राज्यों में मिली कामयाबी यूपीए के पक्ष में निर्णायक साबित हुई।
लेकिन पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के ये दोनों गढ़ उसके हाथ से निकल गए। यही नहीं, कांग्रेस की स्थिति सुधरने के कोई संकेत नहीं मिल रहे। अब सारी निराशा के बीच उसकी आशा टिकी है पंजाब और उत्तर प्रदेश पर।
यह चुनाव शिवसेना और भाजपा के बीच तल्खी के लिए भी जाना जाएगा। कुछ समय से उद्धव ठाकरे भाजपा और मोदी को लगातार निशाना बनाते रहे हैं। क्या वे अब भी वैसा ही करेंगे, और अगर करेंगे, तो क्या भाजपा खामोश रहेगी? उद्धव के हमले नगर महापालिकाओं के चुनावों के मद््देनजर थे, और अब दोनों के बीच सबकुछ सामान्य हो जाएगा? चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे ने भाजपा को गुंडों की पार्टी कहा था और भाजपा ने शिवसेना को माफियाओं की पार्टी कह कर पलटवार किया था। चुनाव हो गए और क्या पता दोनों की बोली बदल जाए और दोनों फिर से गलबहियां डाले नजर आएं। उद्धव ठाकरे ने कहा है कि मुंबई में उनका मेयर होगा और वे इसके लिए भाजपा की मदद नहीं लेंगे। तो क्या नए समीकरण बनेंगे? जो हो, भाजपा अपनी और बढ़ी हुई ताकत के साथ उद्धव के सामने होगी और उद्धव अब मुंबई को केवल अपना गढ़ मान कर नहीं चल सकते।

