यह विचित्र है कि जिस केरल को कुदरती खूबसूरती के लिए ‘भगवान का घर’ के नाम से जाना जाता है, वहां आज राजनीतिक हिंसा की समस्या दिनोंदिन जटिल होती जा रही है। बीते दो-तीन दिनों के दौरान वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच जिस तरह हिंसा हुई है, उससे एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि दोनों पक्षों के बीच वर्चस्व की लड़ाई और हिंसक तेवर में कमी नहीं हो रही है। बुधवार को जहां कोझिकोड के नदापुरम इलाके में आरएसएस के दफ्तर के पास देसी बम से हमला किया गया और उसमें तीन लोग घायल हो गए, वहीं शायद इसके जवाब में विष्णुमंगलम इलाके में माकपा के दफ्तर को जला कर खाक कर दिया गया और डीवाइएफआई के दो कार्यकर्ताओं को काट डाला गया। हैरानी की बात है कि माकपा और आरएसएस के बीच लंबे समय से तीखी और हिंसक भिड़ंत होती रही है, लेकिन आज तक दोनों में से शायद किसी भी पक्ष ने इसके हल की ओर बढ़ने की जरूरत नहीं समझी।
ताजा मामले तब सामने आए, जब उज्जैन में आरएसएस के एक स्थानीय प्रचार प्रमुख कुंदन चंद्रावत ने एक सभा को संबोधित करते हुए फतवा जारी कर दिया कि जो भी केरल के मुख्यमंत्री विजयन का सिर काट कर लाएगा, उसे मैं एक करोड़ रुपए दूंगा! हालांकि बवाल मचने पर आरएसएस ने कुंदन चंद्रावत के बयान से अपना पल्ला झाड़ लिया, लेकिन ऐसी बातें न सिर्फ हिंसा भड़कने की आंशका के मद्देनजर, बल्कि किसी भी स्थिति में कही जाती हैं, तो इसके असर का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह बेवजह नहीं है कि इस बयान के बाद हिंसा का दौर फिर तेज हो गया है। यों केरल में पहले ही माकपा और आरएसएस के कार्यकर्ता आमने-सामने रहते हैं और इसका एक लंबा इतिहास है। पिछले पांच दशक से जारी हिंसा में करीब डेढ़ दशक पहले कुछ सालों तक एक-दूसरे पर हिंसक हमले में कमी आई थी। लेकिन लगभग तीन साल पहले राजनीतिक गतिविधियां फिर से आपसी संघर्ष में बदल गर्इं। यहां तक कि उन मंदिरों को भी इसकी चपेट में लेने खबरें में आर्इं, जहां जाने वाले श्रद्धालुओं में से शायद ही कोई इस टकराव में कोई पक्ष होते हों।
करीब छह महीने मंदिर परिसरों में हथियार छिपाने और आरएसएस की शाखाओं में इसका प्रशिक्षण देने के आरोप सामने आने के बाद केरल में देवोस्वोम विभाग ने इस पर पाबंदी लगाने का प्रस्ताव रखा था। दूसरी ओर, माकपा पर भी सुनियोजित तरीके से आरएसएस के खिलाफ हिंसा करने की शिकायतें आम रही हैं। आज हालत यह है कि दोनों ही पक्ष अपने दो सौ से लेकर तीन सौ कार्यकर्ताओं के मारे जाने का दावा करते हैं। हालांकि यह ध्यान रखने की बात है कि माकपा और आरएसएस के बीच लंबे समय से जारी इस हिंसक संघर्ष के बावजूद इसका स्वरूप अब तक सांप्रदायिक नहीं हुआ है। लेकिन सबसे ज्यादा साक्षरता वाले केरल में अगर यह समस्या गहराती जा रही है, तो यह चिंता की बात इसलिए है कि वर्चस्व के लिए की गई हिंसा किसी एक जगह और एक चरित्र में स्थिर नहीं रहती है। सवाल है कि केरल में दोनों पक्ष में से कौन यह सचमुच चाहता है कि इस हालत में सुधार हो! क्या राजनीतिक वर्चस्व के लिए लोकतांत्रिक तरीके से जनता के बीच पैठ बनाने के बजाय हिंसक संघर्ष ही एकमात्र रास्ता रह गया है?
