पृथ्वी की कक्षा में संचार उपग्रह जीसेट-6ए स्थापित कर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक और बड़ी उपलब्धि अपने खाते में दर्ज करा ली है। इसरो की यह कामयाबी कई मायनों में बड़ी है। जो संचार उपग्रह बनाया गया है वह सैन्य उपयोग के लिहाज से काफी महत्त्वपूर्ण है। इससे मिलने वाली सूचनाएं सेना के लिए बेहद अहम और कारगर होंगी। इनसे दुश्मनों के ठिकानों का पता लगाना आसान हो जाएगा। अभी तक ऐसी सूचनाओं के अभाव में बड़े सैन्य अभियानों को चलाना जरा मुश्किल होता है। लेकिन अब दुश्मन इस संचार उपग्रह की निगाह से बच नहीं पाएगा। संचार उपग्रह का दूसरा बड़ा फायदा मोबाइल संचार में मिलेगा। इसके अलावा नेटवर्क प्रबंधन तकनीक में भी इस उपग्रह से काफी मदद मिलेगी। हालांकि संचार उपग्रह पहले भी छोड़े गए हैं, लेकिन तकनीकी विकास की दृष्टि से यह उपग्रह काफी अहम है। इसरो ने संचार उपग्रह ले जाने वाले यान जीएसएलवी (जियो सेटेलाइट लांच वेहिकल) को भी काफी उन्नत किया है। इसमें तीसरे चरण का स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन लगा है। एक वक्त था जब भारत राकेटों में इस्तेमाल के लिए इंजनों का आयात करता था। पर अब देश में अत्याधुनिक किस्म के राकेट इंजन बनाए जा रहे हैं।
इसरो ने पिछले अड़तालीस सालों में अपनी कामयाबियों के जो झंडे गाड़े हैं, उनकी बदौलत आज भारत दुनिया के उन चुनिंदा मुल्कों में शामिल है जो अंतरिक्ष विज्ञान में दबदबा रखते हैं। भारत अब सिर्फ अपने उपग्रह नहीं छोड़ता, बल्कि दूसरे देशों के उपग्रह भी हमारे राकेटों से छोड़े जाते हैं। यहां तक कई बार विकसित देश भी अपने उपग्रह छोड़ने के लिए इसरो की मदद लेने में संकोच नहीं करते। अंतरिक्ष के इस कारोबार में बड़ी सफलता इस साल बारह जनवरी को तब मिली थी जब श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी (पोलर सेटेलाइट लांच वेहिकल) यान से भारत ने अपने तीन उपग्रह तो छोड़े ही थे, साथ में छह देशों- कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका- के भी अट्ठाईस उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाए। अंतरिक्ष के क्षेत्र में यह दिन मील का पत्थर इसलिए भी था कि इसरो ने इसी दिन अपना सौवां उपग्रह छोड़ा था। पिछले साल 15 फरवरी को इसरो ने एक सौ चार उपग्रह अंतरिक्ष में भेज कर विश्व रेकार्ड बना डाला था। उससे पहले 2014 में रूस ने अंतरिक्ष में एक साथ सैंतीस उपग्रह छोड़े थे। भारत के लिए यह गर्व की बात है कि अंतरिक्ष, राकेट तकनीक और उपग्रह बनाने-छोड़ने में इसरो कामयाबी के नए-नए मुकाम हासिल कर रहा है।
इसरो ने अपनी यात्रा में कई पड़ाव देखे हैं। एक जमाना वह भी था जब हमारे वैज्ञानिक राकेट और लांचरों को साइकिल पर रख कर ही प्रक्षेपण केंद्र तक ले जाते थे। देश में प्रक्षेपण केंद्र तक नहीं थे। इसरो की सबसे बड़ी खूबी स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल है। मंगल मिशन और चंद्रयान मिशन पूरी तरह भारत में विकसित तकनीक की देन हैं। राकेटों के लिए क्रायोजनिक इंजन अब भारत में ही बनते हैं। इसरो ने कम खर्च में बड़ी परियोजनाएं न सिर्फ पूरी की हैं, बल्कि दूसरे देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर कमाई भी कर रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान ऐसा क्षेत्र है जिसमें परियोजनाएं और शोध के लिए भारी-भरकम बजट की जरूरत होती है। इसरो को नासा जैसा बजट और संसाधन पता नहीं कब मिलेंगे, पर उसकी गिनती दुनिया की अव्वल अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसियों में होने लगी है।

