जिस दिन थोक महंगाई में थोड़ी कमी के आंकड़े आए उसी दिन पेट्रोलियम पदार्थों के दाम चढ़ने की भी खबर आई। लिहाजा, महंगाई में तनिक नरमी से मिली राहत छिन सकती है, क्योंकि डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ती है और इसका नतीजा बहुत सारी चीजों की मूल्यवृद्धि के रूप में आता है। डीजल और पेट्रोल के दाम चढ़ने की वजह जानी-पहचानी है और वह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी। यह आकस्मिक नहीं है। ओपेक यानी तेल उत्पादक देशों के संगठन ने उत्पादन एक हद तक सीमित रखने का निर्णय कर रखा है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी होनी ही थी। भारत चूंकि अपनी जरूरत या खपत का करीब तीन चौथाई तेल आयात करता है, इसलिए जब भी कच्चे तेल के दाम में इजाफा होता है भारत को यह चुभे बिना नहीं रहता। पिछले महीने भर में डीजल के दाम में करीब साढ़े तीन रुपए प्रति लीटर और पेट्रोल के दाम में करीब दो रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो चुकी है।
सोमवार को डीजल लगभग बासठ रुपए प्रति लीटर की रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गया और पेट्रोल भी इकहत्तर रुपए प्रति लीटर से ऊपर चला गया। अलबत्ता राज्यों में बिक्री कर या वैट की अलग-अलग दर होने के कारण डीजल और पेट्रोल की कीमतों में राज्यवार कुछ फर्क है। मसलन, मुंबई में वैट की दर ज्यादा होने के कारण वहां डीजल करीब पैंसठ रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया है। तीन साल पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट आई थी, पर इसका कोई खास लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाया, क्योंकि नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच नौ बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया। सिर्फ एक बार उत्पाद शुल्क में दो रुपए प्रति लीटर की कटौती की गई थी। अभी डीजल की कीमत रिकार्ड ऊंचाई पर है और पेट्रोल का दाम अगस्त 2014 के बाद से सर्वोच्च स्तर पर है। लिहाजा, उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क घटाने की मांग शुरू हो गई है। पर केंद्र पेट्रोलियम पर वैट में कटौती की सलाह देकर गेंद राज्यों के पाले में डाल देना चाहता है। इससे अच्छा तो यह होगा कि केंद्र पेट्रोलियम को जीएसटी के तहत लाने की पहल करे। कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी के रुझान से भारत का व्यापार घाटा और भी बढ़ सकता है।
सरकार इस पर फूले नहीं समा रही कि दिसंबर में निर्यात में बारह फीसद का इजाफा हुआ। पर दूसरी तरफ इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि दिसंबर में आयात में इक्कीस फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इसमें कच्चे तेल के दाम में तेजी और सोने का आयात बढ़ने की मुख्य भूमिका रही। दिसंबर 2017 में पेट्रोलियम उत्पादों और कच्चे तेल के आयात में पैंतीस फीसद बढ़ोतरी हुई और यह 10.34 अरब डॉलर पर पहुंच गया। जबकि एक साल पहले की समान अवधि में यह 7.66 अरब डॉलर रहा था। लिहाजा, दिसंबर में व्यापार घाटा बढ़ कर 14.88 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसमें और भी बढ़ोतरी हो सकती है। सरकार पहले ही यह स्वीकार कर चुकी है कि मौजूदा वित्तवर्ष में आर्थिक वृद्धि दर साढ़े छह फीसद रह सकती है, जो कि अपेक्षा से कम होगी। पर इसी के साथ, वित्त मंत्रालय से लेकर नीति आयोग तक, यह दोहराते नहीं थकते कि अगले वित्तवर्ष में वृद्धि दर साढ़े सात-आठ फीसद होगी। लेकिन कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी के रुझान ने सारे सुनहरे पूर्वानुमानों पर सवालिया निशान लगा दिया है।
