कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडू की हफ्ते भर की भारत यात्रा की परिणति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत और दोनों देशों के बीच छह समझौतों के साथ हुई। इन समझौतों में उच्च शिक्षा, ऊर्जा और खेलकूद आदि क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। इस तरह अंत भला तो सब भला के अंदाज में ट्रुडू की इस यात्रा का समापन हुआ। पर इससे पहले जो खटास पैदा हुई थी वह इस अवसर पर भी छिपी न रह सकी, सांकेतिक रूप से सतह पर दिख ही गई। द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत के बाद जब संयुक्त रूप से मीडिया से मुखातिब होने की बारी आई तो मोदी ने कहा कि ऐसे लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है जो राजनीतिक लक्ष्यों के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हों; भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि यह कहने के पीछे मोदी का इशारा किधर रहा होगा। अमूमन ऐसे मौकों पर भारतीय नेतृत्व की शब्दावली ऐसी होती है कि सीमापार आतंकवाद और इस तरह पाकिस्तान की तरफ ध्यान जाता हो। लेकिन मोदी ने जो कहा उसमें साफ तौर पर इशारा खालिस्तानी आतंकवादी जसपाल अटवाल की तरफ था। अटवाल के कारण ही ट्रुडू की यात्रा विवाद में घिर गई थी।
मुंबई में ट्रुडू के स्वागत में हुए एक समारोह में अटवाल की मौजूदगी से हंगामा मच गया। यही नहीं, बाद में खुलासा हुआ कि दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग में एक भोज-समारोह में शामिल होने के लिए भी उसे निमंत्रित किया गया था। अलबत्ता उसे निमंत्रित किए जाने की बात सामने आते ही वह समारोह रद्द कर दिया गया। इसलिए जब मोदी ने देश की एकता और अखंडता को बर्दाश्त न करने की बात कही, तो शायद वे कनाडाई अतिथि को यह जताना चाहते रहे होंगे कि उन्हें भारत की चिंताओं का खयाल रखना चाहिए। अटवाल की वजह से विवाद खड़ा होने से पहले भी यह लग रहा था कि ट्रुडू को लेकर भारत सरकार कुछ खास उत्साहित नहीं है, जबकि वे कोई निजी नहीं, बल्कि आधिकारिक यात्रा पर आए थे। हाल में कई राष्ट्राध्यक्षों की अगवानी करने के लिए मोदी प्रोटोकॉल की परवाह न करते हुए हवाई अड््डे पहुंचे थे। लेकिन हवाई अड््डे पर ट्रुडू का स्वागत करने न प्रधानमंत्री पहुंचे न कोई केंद्रीय मंत्री। परिवार सहित ट्रुडू ताजमहल देखने आगरा गए, साबरमती आश्रम गए। पर न उत्तर प्रदेश में न गुजरात में वहां के मुख्यमंत्री ने मिल कर उनकी अगवानी की। इस ठंडे रुख के पीछे क्या वजह रही होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
ट्रुडू की लिबरल पार्टी के कई नेताओं और मंत्रियों के बारे में माना जाता है कि खालिस्तानी आंदोलन से उनका करीबी रिश्ता है। कनाडा में लाखों सिख बसे हैं। उनके पास वोट की ताकत भी है और चुनाव में चंदे से मदद करने की भी। इसी ताकत और इसी मदद का हवाला देकर जसपाल अटवाल जैसे तत्त्व अपना उल्लू सीधा करते हैं, राजनीतिक पैठ बनाते हैं या राजनीतिक संरक्षण हासिल करते हैं। लिबरल पार्टी के नेताओं और मंत्रियों को कनाडा के आम सिख समाज और अटवाल जैसे लोगों के बीच फर्क करना होगा। इस मामले में भारत ने इशारों में भी और जाहिराना तौर पर भी सख्त संदेश दिया है। द्विपक्षीय मसलों पर मोदी और ट्रुडू के बीच हुई बातचीत से उम्मीद की जानी चाहिए कि जो थोड़ी-सी वक्ती खटास पैदा हुई वह धुल गई होगी और दोनों देशों के रिश्ते बेहतर ही होंग

