बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट को एक अनिवार्य सुविधा के रूप में देखा जाता है। ऐसी इमारतों में घरों की खरीद-बिक्री के समय सबसे पहले यही देखा जाता है कि आवाजाही के लिए लिफ्ट की सुविधा है या नहीं। घर की खरीद-बिक्री में लोगों को आकर्षित करने के लिए विज्ञापनों में आधुनिक लिफ्ट को एक विशेष पहलू के रूप में पेश किया जाता है।
मगर पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जो ऊंची इमारतों की रिहाइश के सपने में एक अतिरिक्त भय की स्थितियां पैदा कर रही हैं। खासतौर पर दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ऐसे कई हादसे हुए, जिनमें लिफ्ट के टूटने या बंद होने की वजह से या तो लोगों की जान चली गई या फिर उन्हें गंभीर जोखिम का सामना करना पड़ा।
गौरतलब है कि मंगलवार को पश्चिमी ग्रेटर नोएडा के थाना बिसरख कोतवाली इलाके में स्थित एक आवासीय सोसाइटी में लगी दो लिफ्ट अचानक से बीच में ही रुक गई। उनमें आठ स्कूली बच्चों सहित बारह लोग मौजूद थे, जो लिफ्ट में ही फंस गए। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कोई बड़ी अनहोनी भी हो सकती है, लेकिन गनीमत है कि करीब पैंतीस मिनट की जद्दोजहद के बाद सोसाइटी के लोगों ने उन सबको किसी तरह बाहर निकाला।
विचित्र यह है कि लिफ्ट में फंसे लोगों ने इंटरकाम और अन्य तकनीक के जरिए मदद के लिए संपर्क करने की भी कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। स्वाभाविक ही अब समूची सोसाइटी के लोग वहां लगी लिफ्ट के इस्तेमाल को लेकर एक डर से गुजर रहे होंगे। संभव है कि इस हादसे को महज एक तकनीकी बाधा के तौर पर देखा जाए, लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कोई तकनीक जीवन को जिस तरह आसान और सुविधाजनक बनाता है, उसी में बहुत छोटी लापरवाही, चूक या मामूली खराबी की वजह से लोगों की जान भी चली जाती है।
इस तरह की यह कोई अकेली या पहली घटना नहीं है, जिसमें लिफ्ट की खराबी की वजह से लोगों और बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ी। करीब दो महीने पहले ग्रेटर नोएडा में ही एक बहुमंजिला इमारत की लिफ्ट गिर गई थी, जिसमें नौ लोग मारे गए थे। तब भी कारण के रूप में संचालन से लेकर रखरखाव में लापरवाही ही सामने आई थी।
विडंबना यह है कि इस तरह के हादसे बार-बार सामने आने के बावजूद बहुमंजिला इमारतों के प्रबंधनों को यह सुनिश्चित करने की जरूरत नहीं लग रही है कि लिफ्ट के जरिए लोगों की आवाजाही को सुरक्षित बनाई जाए। तकनीकी खराबी को दुरुस्त करने के साथ-साथ सिर्फ निर्धारित और नियमित जांच से ही लिफ्ट हादसे के जोखिम से लगभग पार पाया जा सकता है।
फिर लिफ्ट के संचालन को लेकर सब कुछ कई बार वहां रहने वाले लोगों के भरोसे ही छोड़ दिया जाता है। सामान, वजन, लिफ्ट के इस्तेमाल को लेकर सामान्य जानकारी के अभाव की वजह से भी मुश्किल खड़ी हो जा सकती है। इसके अलावा, आपात स्थिति में सुरक्षा इंतजामों और सुरक्षा गार्डों सहित वहां रहने वाले लोगों के प्रशिक्षण को लेकर भी उदासीनता बरती जाती है।
आमतौर पर जब तक कोई हादसा नहीं होता, तब तक ऊंची इमारतों का रखरखाव विभाग नींद में खोया रहता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने लिफ्ट से होने वाले हादसों को रोकने के मकसद से एक सख्त कानून लाने की बात कही है, मगर सबसे ज्यादा जरूरी लिफ्ट की गुणवत्ता, रखरखाव और उसके संचालन में हर स्तर पर सावधानी सुनिश्चित करने की है।
