पश्चिम बंगाल के उत्तर चौबीस परगना जिले के बशीरहाट के बादुरिया इलाके में सोमवार की रात जो हुआ वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। फेसबुक पर डाली गई एक आपत्तिजनक पोस्ट के कारण दो समुदायों के बीच टकराव हो गया। आगजनी और हिंसा की घटनाएं हुर्इं। उपद्रवी भीड़ ने दुकानों और मकानों के अलावा पुलिस की कई गाड़ियों में भी आग लगा दी। पुलिस अधीक्षक, सहायक पुलिस अधीक्षक और कुछ अन्य पुलिस अफसरों समेत कोई चालीस लोग घायल हो गए। हालात की गंभीरता को देखते हुए सीआरपीएफ के भी जवानों की तैनाती करनी पड़ी। कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है, सांप्रदायिक टकराव या दंगे पर काबू पाना। ऐसे मौकों पर भीड़ सिर्फ अराजक नहीं, उन्मादी भी होती है। फिर, स्वार्थी तत्त्व जो मौके की ताक में रहते हैं, शांति स्थापना में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आते। अफवाहों का बाजार गरम रहता है और आम लोगों कोकुछ समय के लिए यह जान पाना मुश्किल होता है कि कौन-सी बात सही है, कौन-सी गलत। जब तक सही-गलत का पता चलता है, या उन्माद का ज्वार उतरता है, बहुत कुछ बिगड़ चुका होता है। फिर, एक नई परिघटना यह देखने में आ रही है कि जो इंटरनेट जानकारियों का खजाना और संवाद का सबसे बड़ा मंच है, वह भ्रम तथा अफवाह फैलाने का भी जरिया बन रहा है। कुछ साल पहले, अफवाहबाजी का सहारा लेकर ही बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई जैसे शहरों से पूर्वोत्तर के लोगों को भागने के लिए मजबूर किया गया था।
सोशल साइट के जरिए अफवाह तथा अशांति फैलाने के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। बशीरहाट इस सिलसिले की एक ताजा कड़ी है कि फेसबुक का इस्तेमाल सौहार्द बिगाड़ने के लिए भी हो सकता है। राज्य सरकार ने हालात पर नियंत्रण पाने के क्रम में उत्तर चौबीस परगना में इंटरनेट सेवा पर कुछ समय के लिए पाबंदी लगा दी है। बहरहाल, यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि बशीरहाट का वाकया मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच तकरार का सबब बन गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी पर उन्हें ‘धमकी देने तथा अपमानित करने’ का आरोप लगाया है। संदर्भ यह है कि बशीरहाट के घटनाक्रम के संदर्भ में राज्यपाल के बुलावे पर मुख्यमंत्री राजभवन गई थीं। तब केशरीनाथ त्रिपाठी ने कुछ ऐसा कहा होगा, जो ममता बनर्जी को नागवार गुजरा होगा। राजभवन ने एक विज्ञप्ति जारी कर मुख्यमंत्री के बयान पर आश्चर्य जताया है और यह सफाई दी है कि राज्यपाल ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो मुख्यमंत्री के लिए अपमानजनक हो; वे मुख्यमंत्री का काफी सम्मान करते हैं।
जैसा कि राजभवन ने भी अपनी विज्ञप्ति में कहा है, राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच हुई बातचीत गोपनीय प्रकृति की थी। इसलिए हम यही नहीं जान सकते कि किसने क्या कहा और उसमें चुभने वाली बात क्या थी। पर संदर्भ ज्ञात होने से यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि संभवत: कानून व्यवस्था संबंधी कुछ नसीहत राज्यपाल ने दी होगी और यह मुख्यमंत्री को रास नहीं आया होगा। अपनी संवैधानिक स्थिति का हवाला देकर राज्यपाल मुख्यमंत्री को तलब करने का औचित्य ठहराने की कोशिश कर सकते हैं। पर क्या दार्जीलिंग में आगजनी, उपद्रव और अनिश्चितकालीन बंदी के दौरान भी उन्हें कानून-व्यवस्था की इतनी ही चिंता हुई थी, और उन्होंने मुख्यमंत्री को तलब किया था? दरअसल, राज्यपाल को नहीं, केंद्रीय गृहमंत्री को रिपोर्ट या कैफियत मांगनी चाहिए थी, जैसा कि उन्होंने बाद में किया भी। बंगाल के इस विवाद से एक बार फिर इस तर्क की पुष्टि होती है कि राज्यपाल ऐसे लोग नहीं बनाए जाने चाहिए जो दलगत राजनीति में रहे हों। केंद्र-राज्य संबंधों पर विचार के लिए बने सरकारिया आयोग ने भी इसी आशय की सिफारिश की थी।
