मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटा कर स्मृति ईरानी को कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि शिक्षा संस्थानों के साथ उनके टकराव के चलते सरकार को बदनामी झेलनी पड़ रही थी, इसलिए उनका मंत्रालय बदल दिया गया। कुछ का कहना है कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें प्रचार-प्रसार की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, इसलिए उन्हें हल्के कामकाज में लगाया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी बदलने से खासकर शिक्षा जगत के लोग खुश हैं कि अब कुछ बेहतर फैसले हो सकेंगे।
यों शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभालने के साथ ही स्मृति ईरानी विवादों में घिर गई थीं। निर्वाचन आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने खुद को स्नातक बताया था, पर छानबीन के बाद पता चला कि वे स्नातक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई थीं। इसलिए सवाल उठने लगा कि जो व्यक्ति खुद स्नातक नहीं है, उसे शिक्षा जैसे जिम्मेदार विभाग का कामकाज क्यों सौंपा जाना चाहिए! उन्हें यह विभाग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीबी होने की वजह से मिला था। मगर शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह के फैसलों और दूरदर्शिता की जरूरत होती है, उस कसौटी पर वे लगातार विफल नजर आर्इं। फिर हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति को पत्र लिखने और विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से लगातार पड़ते दबावों की वजह से रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर भी ईरानी को कठघरे में खड़ा होना पड़ा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय से जुड़े फैसलों को लेकर भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते रहे। संभव है, सरकार ने इस किरकिरी से बचने के लिए उनका मंत्रालय बदला हो।
संसद के बजट सत्र में स्मृति ईरानी ने विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए जैसा तल्ख तेवर अपनाया उससे पार्टी का उन पर भरोसा बढ़ा। वैसे भी अभिनेत्री होने के नाते आम लोगों में उनका आकर्षण है और चुनाव प्रचार में उन्हें उतारा जाता रहा है। अमेठी में उनके प्रचार-प्रसार का तरीका पार्टी की अपेक्षा के अनुरूप था, इसलिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में भाजपा उन्हें प्रचारक के रूप में उतारना चाहेगी। मगर कामकाज बदल कर चुनाव प्रचार के लिए उन्हें अवकाश देने का फैसला तर्क से परे है। दरअसल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में रहते हुए स्मृति ईरानी ने जैसी किरकिरी सरकार और पार्टी की कराई, वैसी किसी दूसरे मंत्री की वजह से नहीं हुई। जर्मन भाषा हटा कर सरकारी स्कूलों में संस्कृत पढ़ाने के उनके फैसले के चलते जर्मनी की सरकार के सामने भी केंद्र को सफाई देनी पड़ी थी।
शायद प्रधानमंत्री को समझ में आ गया है कि शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी किसी ऐसे व्यक्ति को सौंप कर काम नहीं चलाया जा सकता, जिसे इस क्षेत्र का कोई अनुभव न हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बदलाव को लेकर सरकार पर दबाव है। उधर यूजीसी के फैसलों को लेकर देश भर के विश्वविद्यालयों में शिक्षक आंदोलन पर हैं। इन सबको संभालना स्मृति ईरानी के बूते की बात नहीं थी। ईरानी के कामकाज को देखते हुए शायद प्रधानमंत्री को यह भी समझ में आया हो कि किसी को उपकृत करने की मंशा से मंत्री बना देने पर सरकार को इसी तरह परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्मृति ईरानी को इतनी अहम जिम्मेदारी सौंपने से पहले ही प्रधानमंत्री ने गंभीरता से विचार कर लिया होता तो सरकार को ऐसी फजीहत न झेलनी पड़ती।

