सत्ता जिसके पक्ष में होती है, वह किस कदर बेखौफ हो जाता है, इसका नमूना एक बार फिर चंडीगढ़ और गुजरात के बनासकांठा में देखने को मिला। गुजरात में एक स्थानीय भाजपा नेता के उकसावे पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की कार पर पत्थर फेंके गए, तो चंडीगढ़ में हरियाणा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने आधी रात को एक प्रशासनिक अधिकारी की बेटी से छेड़छाड़ की कोशिश की। गुजरात के स्थानीय नेता को गिरफ्तार कर लिया गया है। चंडीगढ़ वाले मामले में भी पीड़िता की शिकायत पर हरियाणा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे को पुलिस ने गिरफ्तार किया, पर उसे थाने से ही जमानत देकर छोड़ दिया। दोनों मामलों को लेकर इसलिए बहस हो रही है क्योंकि ये उच्च पदस्थ लोगों से जुड़े हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सत्ता के करीबी लोग जब किसी सामान्य या कमजोर नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार करते होंगे, तो उनके खिलाफ प्रशासन कितनी सख्ती बरत पाता होगा। हालांकि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भरोसा दिलाया है कि आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, मगर यह कहां तक संभव हो पाएगा, देखने की बात है।

भाजपा जिन बातों के लिए दूसरे दलों पर आरोप लगाती रही है, अब वही सब उसमें भी दिखाई देने लगा है। वह पार्टी में शुचिता और अनुशासन का दावा करते नहीं थकती, पर हकीकत यह है कि उसके नेता, नेताओं के परिजन और कार्यकर्ता बेखौफ आपराधिक घटनाएं करते देखे जा रहे हैं। पहले ही भाजपा को धर्मांतरण, गोरक्षा, अल्पसंख्यकों के प्रति द्वेष के चलते मारपीट, यहां तक कि हत्या को लेकर काफी किरकिरी झेलनी पड़ रही है। उस पर पार्टी के जिम्मेदार नेता और उनके परिजन कानून-व्यवस्था तोड़ते पाए जाते हैं, तो पार्टी की छवि और धूमिल होगी। हरियाणा वह राज्य है, जहां से प्रधानमंत्री ने अपनी महत्त्वाकांक्षी योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत की थी। दूसरे, चंडीगढ़ आमतौर पर महिलाओं के लिए सुरक्षित शहर माना जाता है। पर जब खुद हरियाणा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे को महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की फिक्र नहीं है, तो पार्टी के किसी सामान्य कार्यकर्ता से इसकी कितनी उम्मीद की जा सकती है। फिर चंडीगढ़ पुलिस इस कदर सरकार के प्रभाव में काम कर रही है, तो छोटी जगहों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामले में उससे कितनी मुस्तैदी और न्याय की उम्मीद की जा सकती है।

दरअसल, सत्ता से संबद्ध और उसके करीबी लोगों में अक्सर यह दंभ पैदा हो जाता है कि प्रशासन उनकी मुट्ठी में है, इसलिए वे कानून-व्यवस्था की परवाह नहीं करते। भाजपा के लोग अनुशासन की चाहे जितनी दुहाई दें, उनमें भी यही भरोसा देखा जाता है कि अगर वे कानून या फिर संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ कुछ करते हैं, तो उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। फिर कुछ लोग खुद को सत्ता के करीब या पार्टी हाईकमान की नजर में लाने की होड़ में भी लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करते देखे जाते हैं। राहुल गांधी के साथ बनासकांठा में जो हुआ, उसके पीछे यही मंशा थी। मगर ऐसी घटनाओं से भाजपा के प्रति यही संदेश जाता है कि उसमें भी दूसरी पार्टियों की तरह ही आपराधिक वृत्ति के लोग हैं और प्रशासन को उनके खिलाफ कड़े कदम उठाने से रोका जाता है। जब तक भाजपा नेता लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन का भरोसा नहीं दिलाते, न तो ऐसी घटनाएं रुकेंगी और न पार्टी की छवि में किसी सुधार की उम्मीद जगेगी।