देश में जाति के आधार पर भेदभाव के बर्ताव की खबरें आम रही हैं। इस तरह के सामाजिक बर्ताव से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को संरक्षण देने के लिए बाकायदा कानूनी व्यवस्था है। लेकिन हाल के दिनों में कुछ ऐसे आरोप लगाए गए कि इन कानूनों का सहारा लेकर कुछ निर्दोष लोगों को भी परेशान किया जाता है। इस संदर्भ में महाराष्ट्र के एक मामले में सुनवाई के बाद मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के दुरुपयोग की शिकायतों के मद्देनजर अब ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले जांच जरूरी होगी और आरोपी को अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है। मामला दर्ज करने से पहले उसके सही होने के आधार के बारे में डीएसपी स्तर का पुलिस अधिकारी प्रारंभिक जांच करेगा। यही नहीं, अगर आरोपी सरकारी अफसर है तो उसकी गिरफ्तारी से पहले उसके उच्च अधिकारी से अनुमति जरूरी होगी। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों के दुरुपयोग की रोकथाम के मकसद से ये दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अगर किसी कानून का लगातार बेजा इस्तेमाल होता हो तो इस तरह की व्यवस्था वाजिब है। लेकिन सवाल है कि हमारे देश के ज्यादातर लोग जिन सामाजिक मानदंडों और सोच के साथ जीते हैं, उसमें दमन-शोषण के शिकार समुदायों के लिए कानून के तहत इंसाफ का रास्ता क्या होगा!

गौरतलब है कि पिछले साल महाराष्ट्र में कुछ संगठनों ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून, 1989 के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग का दावा किया था। इसके बरक्स करीब नौ महीने पहले महाराष्ट्र पुलिस ने विस्तृत आंकड़ों के आधार पर सरकार को सूचित किया था कि यह कानून दलित समुदाय के अधिकारों की रक्षा करता है और इसका बेजा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। पुलिस ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में यह भी बताया था कि ज्यादातर आरोपियों के बरी होने का कारण गवाह का अपने बयान से पलट जाना होता है। इसमें कोई शक नहीं है कि अगर किसी मुकदमे में गवाह अपने बयान पर कायम नहीं रह पाता और आरोपी बरी हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति को कानून के दुरुपयोग का मामला कहा जा सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि हाशिये पर जीने वाले दलित-वंचित समुदायों की सामाजिक हैसियत क्या होती है और उनके सामने अपने दमन-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने के क्या विकल्प होते हैं, उन्हें चुप कराने के लिए आज भी समाज की वर्चस्वशाली जातियों के लोग किन तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।

मंगलवार को ही सरकार ने लोकसभा में बताया कि अकेले 2016 में देश भर में दलितों के खिलाफ भेदभाव और अपमान से जुड़े चालीस हजार सात सौ चौहत्तर मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा, लगभग तीन महीने पहले जारी हुए राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2015 के मुकाबले 2016 में दलित समुदाय के खिलाफ अत्याचार और अपराध के मामलों में साढ़े पांच फीसद की बढ़ोतरी हुई। यह किसी से छिपा नहीं है कि सामाजिक विकास और कमजोर तबकों के बीच सशक्तीकरण की प्रक्रिया धीमी या आधी-अधूरी होने की वजह से आज भी जातिगत अपराधों की कई शिकायतें सामने नहीं आ पातीं। लेकिन पिछले कुछ सालों में बढ़ती जागरूकता के बीच अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग अब अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ संवैधानिक अधिकारों और कानूनों का सहारा लेने के लिए आगे आने लगे हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस कानून के दुरुपयोग की रोकथाम करते हुए दलित-वंचित जातियों और समुदायों के लोगों को इंसाफ मिलने में कोई अड़चन नहीं पैदा की जाए।