पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सराहनीय कदम उठाते हुए महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में प्लास्टिक और थर्मोकोल के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इस फैसले के तहत अब प्लास्टिक की थैलियां, बैग, पाउच, कप-प्लेट-चम्मच जैसी चीजों के उत्पादन पर पूरी तरह से मनाही होगी। अगर कोई इन्हें बेचता या लाता-ले जाता नजर आया तो उसे सजा भुगतनी होगी। सरकार ने पाबंदी का उल्लंघन करने वालों पर पच्चीस हजार रुपए का जुर्माना और तीन साल जेल की सजा तय की है। हालांकि कुछ मामलों, मसलन दवाइयों और प्रसंस्करित उत्पादों की पैकिंग, बागवानी उत्पादों और पौधों को लपेटने, ठोस कचरे के निपटान और निर्यात के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल होता रहेगा। इसके अलावा, विशेष आर्थिक क्षेत्रों को भी इस प्रतिबंध से अलग रखा गया है। सवाल है कि अगर पाबंदी की ताजा घोषणा रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक के इस्तेमाल को बंद करने की है तो विशेष आर्थिक क्षेत्र में या कुछ अन्य जगहों पर इसके प्रयोग में छूट से इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकेगा? हालांकि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से बेहद अहम सरकार का यह फैसला इसलिए भी जरूरी था कि पिछले कुछ सालों से बारिश के मौसम में मुंबई को बाढ़ जैसी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है और उसमें प्लास्टिक कचरे की भूमिका बड़ी मानी गई। बारिश के दिनों में सारे नाले कचरे से जाम हो जाते हैं और इसका बड़ा हिस्सा प्लास्टिक की थैलियां ही होती हैं।
इससे पहले पोलिथीन या प्लास्टिक की थैलियों पर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड जैसे राज्य भी प्रतिबंध लगा चुके हैं। लेकिन घोषणा के बरक्स व्यवहार में इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। जिन राज्यों ने पाबंदी लगाई, वहां आज भी धड़ल्ले से प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल हो रहा है। सरकार की ओर से ऐसा कोई पुख्ता बंदोबस्त नजर नहीं आता जो प्रतिबंध पर अमल को सुनिश्चित कराए। सरकारों को प्लास्टिक के इस्तेमाल पर सख्ती बरतने की जरूरत तब लगती है जब इस मसले पर एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित पंचाट और कुछ अदालतें साफ दिशा-निर्देशों जारी करती हैं और उससे दबाव बनता है। खासतौर पर हिमालय क्षेत्र और गंगा-यमुना जैसी नदियों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर एनजीटी ने सख्ती दिखाई और कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर सरकारों को फटकार लगाई। फिर भी सरकारों की ओर से व्यवहार में ऐसी पहलकदमी नहीं देखी गई जो इस मसले पर उनकी गंभीरता को दर्शाती हो।
इसमें कोई शक नहीं कि प्लास्टिक से बने सामान हमारे रोजमर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। रोजाना हम जितनी भी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें काफी सामान प्लास्टिक के बने होते हैं या उनके निर्माण में प्लास्टिक की भूमिका होती है। इसलिए प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह खत्म कर पाना मुश्किल है। लेकिन इसका असर यह पड़ता है कि प्लास्टिक की वजह से हमारे आसपास के पर्यावरण को व्यापक नुकसान पहुंचता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि कानूनी पाबंदी से इतर भी हम अपने जीवन में प्लास्टिक के इस्तेमाल को न्यूनतम स्तर तक लाएं। इसके लिए कानून से भी बड़ी जरूरत लोगों को इस बारे में जागरूक बनाने की है। लोगों को इस बारे में बताना होगा कि प्लास्टिक का प्रयोग इंसान के लिए किस तरह जानलेवा होता जा रहा है। आज प्लास्टिक से पैदा होने वाला कचरा इस धरती के लिए एक बड़ा संकट बन चुका है। इसके इस्तेमाल को घटाने के लिए ऐसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हों।

