एक रोज पहले नया वित्तवर्ष शुरू हो गया। इसी के साथ कुछ वित्तीय बदलाव भी लागू हो गए। इनमें सबसे अहम है ई-वे बिल। कर चोरी रोकने और कर संग्रह को भरसक डिजिटल रूप देने के इरादे से ई-वे बिल का तरीका अपनाया गया है। यों सरकार की मंशा के मुताबिक इसकी शुरुआत और पहले हो जानी चाहिए थी। पर तकनीकी और व्यवस्थागत खामियों के चलते इसे कई बार टालना पड़ा। अब भी खुद केंद्रीय वित्त सचिव हंसमुख अधिया आश्वत नहीं हैं कि व्यापारी, वितरक और ट्रक मालिक इसके लिए तैयार हैं। गौरतलब है कि जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के तहत कारोबारियों और ट्रक परिचालकों को पहली अप्रैल से अंतर-राज्यीय यानी एक राज्य से दूसरे राज्य में पचास हजार रुपए से अधिक का माल लाने और ले जाने के लिए सबूत के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से प्राप्त किया गया मार्ग-विपत्र (ई-वे बिल) साथ में रखना होगा। पहले यह व्यवस्था एक फरवरी से लागू की जानी थी। पर तब पहले रोज ही ई-वे बिल पोर्टल चरमरा गया था, और तब तक 4 लाख 80 हजार बिल बन पाए थे। इस अनुभव ने सरकार को तैयारियों पर नए सिरे से सोचने को विवश किया।
लिहाजा, पोर्टल की क्षमता आंकने के लिए कई परीक्षण किए गए। और अब सरकार का दावा है कि ई-वे बिल प्रणाली को पहले से दक्ष बनाया गया है और अब इससे बिना किसी मुश्किल के पचहत्तर लाख ई-वे बिल रोजाना निकाले जा सकते हैं। आपूर्तिकर्ता के लिए ई-वे बिल उन वस्तुओं की भी अंतरराज्यीय ढुलाई के लिए बनाना होगा, जो जीएसटी के तहत नहीं आती हैं। इस बिल में आपूर्तिकर्ता, ट्रांसपोर्ट और ग्राहक का ब्योरा होता है। माल की कीमत पचास हजार रुपए से ज्यादा होने पर आपूर्तिकर्ता को इसकी जानकारी जीएसटीएन पोर्टल पर दर्ज करानी होगी। ई-वे बिल लागू होने से पहले सामान्य से ज्यादा माल ढुलाई कर से बचने की कोशिशों की ओर ही संकेत करती है। ऐसे में सामान्य से ज्यादा माल जमा हो जाने के कारण यह संभव है कि शुरू के कुछ दिनों में ई-वे बिल के जरिए कर संग्रह अपेक्षा से कम हो। लेकिन उम्मीद है कि कुछ दिन बाद गाड़ी पटरी पर आ जाएगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ई-वे बिल व्यवस्था के ठीक से आकार लेने में अभी कम से कम एक पखवाड़ा लग सकता है।
एक अप्रैल से कुछ और भी वित्तीय बदलाव लागू हुए। मसलन, आय कर पर उप-कर की बढ़ोतरी लागू हो गई। स्वास्थ्य व शिक्षा उप-कर तीन से चार फीसद किया गया है। ढाई सौ करोड़ रुपए तक के कारोबार वाली कंपनियों पर कंपनी-कर घटा कर पच्चीस फीसद किया गया है। छोटे और मझोले उद्यमों के अलावा बचत के भरोसे रहने वाले लोगों खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी राहत की एक पहल अमल में आ गई। अब पचास हजार रुपए तक का ब्याज कर-रहित होगा। अभी तक दस हजार रुपए तक के ब्याज पर कर नहीं लगता था। धारा 80 डी के तहत स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर किए गए भुगतान व चिकित्सा व्यय पर कर कटौती की सीमा भी तीस हजार से पचास हजार रुपए कर दी गई है। राहत का एक और उपाय भी कल से लागू हो गया। एनपीएस यानी नेशनल पेंशन सिस्टम में जमा रकम निकालने पर कर-छूट का लाभ अब उन लोगों को भी मिलेगा, जो अपना कारोबार करते हैं। उन्हें एनपीएस से पैसे निकालने पर चालीस फीसद हिस्से पर कर नहीं देना होगा।

