संचार उपग्रह जीसैट-6 ए का नियंत्रण कक्ष से अब तक संपर्क स्थापित नहीं हो पाना चिंता की बात तो है ही, साथ ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए बड़ा झटका भी है। इसरो ने पिछले गुरुवार को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी के जरिए इस उपग्रह को छोड़ा था। लेकिन दो दिन बाद ही इसमें गड़बड़ी आ गई। रविवार को इसरो ने आधिकारिक रूप से बताया कि जीसैट-6 ए से संपर्क टूट गया है। गौरतलब है कि इसमें 31 मार्च की सुबह तक सब ठीक होने की खबर थी और उपग्रह को दूसरी कक्षा में पहुंचा दिया गया था। अगले दिन यानी एक अप्रैल को इसे तीसरी और अंतिम बार कक्षा में पहुंचाने के लिए इंजन दागा जाना था। लेकिन उसके पहले ही संपर्क टूट गया था। इसरो प्रमुख ने खुद भी माना है कि संपर्क टूटने की शुरुआती वजह उपग्रह को सौर ऊर्जा मुहैया कराने वाली प्रणाली में खराबी आना हो सकती है। नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटने की सूरत में उपग्रह सामान्यतया पांच से छह मिनट में सेफ मोड से सामान्य मोड में आ जाते हैं और नियंत्रण कक्ष से संपर्क कायम हो जाता है। लेकिन जीसैट-6 ए के मामले में ऐसा नहीं हुआ।

अभी तक नियंत्रण कक्ष को इस बारे में संकेत नहीं मिले हैं कि उपग्रह कहां है। हालांकि अभी यह कह देना जल्दबाजी होगी कि इसरो का यह मिशन पूरी तरह से नाकाम हो गया है। लेकिन जिस तरह शनिवार को पूरे दिन इसरो ने इस खबर को दबाए रखा, उससे लोगों के मन में संदेह पैदा हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि इस गड़बड़ी से निपटने के लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम कोई कसर नहीं छोड़ेगी। लेकिन ज्यों-ज्यों वक्त बीतता जा रहा है, उम्मीदें धूमिल पड़ती जा रही हैं और मिशन की कामयाबी को लेकर संदेह गहराता जा रहा है। सवाल उठता है कि दो सौ सत्तर करोड़ रुपए खर्च से तैयार जिस उपग्रह को दस साल तक काम करना था, वह दो दिन के भीतर ही कैसे ध्वस्त हो गया! जाहिर है, इसकी कोई एक वजह भी हो सकती है और अनेक भी। लेकिन इसमें कोई आकलन की या फिर तकनीकी चूक रही होगी।

यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब इसरो को इस तरह की विफलता का सामना करना पड़ा हो। पिछले बीस साल में यह छठा मौका है जब इसरो के एक बड़े और महत्त्वपूर्ण अभियान को झटका लगा है। इससे पहले इसरो चार संचार उपग्रह और एक नेविगेशन उपग्रह छोड़ चुका है, जो अपने मिशन में कामयाब नहीं हो सके। सबसे पहला संचार उपग्रह आइएनएसटी-2डी जून 1997 में छोड़ा गया था। इसके बाद जुलाई 2006, अप्रैल 2010 और दिसंबर 2010 में संचार उपग्रह छोड़े गए थे। पिछले साल अगस्त में एक नेविगेशन उपग्रह छोड़ा गया था। और पीछे जाएं तो पिछले बत्तीस साल में बारह बार ऐसा हुआ जब ऐसे मिशन नाकाम रहे। इनमें असफलता के मामले सबसे ज्यादा संचार उपग्रहों में सामने आए। जीसैट-6 ए संचार उपग्रह की अहमियत सेना के संचार तंत्र के लिए है और इसे खासतौर से सैन्य उपयोग के मकसद से तैयार किया गया था। इससे जो आंकड़े और जानकारियां मिलनी हैं, उनसे दुश्मन के ठिकानों का सटीक पता चल सकेगा। जाहिर है, अगर इसरो का नियंत्रण कक्ष इससे संपर्क स्थापित नहीं कर पाता है तो यह सैन्य अभियानों के लिए भी बड़ा झटका साबित हो सकता है। इसके बावजूद उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए यह एक सबक होगा।