काम-धंधे की खातिर दूसरे देश में जाने को मजबूर गरीब भारतीयों को कैसे कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ता है इसकी ताजा बानगी झारखंड से मलेशिया गए पैंतीस मजदूरों की आपबीती है। झारखंड के गिरिडीह, बोकारो, सिमडेगा और हजारीबाग समेत कई जिलों से ताल्लुक रखने वाले ये लोग मजदूरी की खातिर मलेशिया जाने को तैयार हो गए। जैसा कि ऐसे मामलों में अमूमन होता है, वे एजेंट के जरिए ले जाए गए। उन्हें ‘लीड मास्टर इंजीनियरिंग ऐंड कंस्ट्रक्शन एसडीएन डॉट बीएचडी कंपनी’ ने काम पर रखा। लेकिन इन लोगों को न तो वक्त से पगार मिलती है न लौटने दिया जा रहा है। उनके कागजात कंपनी ने जब्त कर लिये हैं। इन प्रवासी मजदूरों का कहना है कि कंपनी के साइट मैनेजर से मजदूरी के भुगतान की मांग की जाती है, तो वह साफ मना कर देता है। यही नहीं, मारपीट की धमकी भी देता है। करार के मुताबिक मजदूरी का पैसा एजेंट को दिया जाएगा। फिर, वह पैसा एजेंट के जरिए मजदूरों को मिलेगा। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि एजेंट अपना ‘कमीशन’ काट कर ही पैसा देता होगा।

अगर सिर्फ कमीशन काटने की बात होती, तो मामला यहां तक न पहुंचता कि उन मजदूरों के परिजन विदेश मंत्रालय को पत्र लिखते, क्योंकि वे पहले से जानते थे कि उन्हें एजेंट के जरिए काम मिल रहा है और एजेंट इसकी कीमत वसूलेगा। लेकिन हालत तो यह है कि मजदूरी मांगना ही गुनाह है। उन्हें लौटने भी नहीं दिया जा रहा। फिलहाल उनकी हालत घर के न घाट के वाली है। कुछ समय पहले हैदराबाद से काम-धंधे की तलाश में मलेशिया गए कुछ मजदूरों को भी ऐसे ही त्रासद अनुभवों से गुजरना पड़ा। खाड़ी देशों में कामगार के तौर पर गए भारतीय लोगों के भी शोषण और उत्पीड़न की खबरें बरसों से आती रही हैं। ऐसे बहुत सारे वाकयों के बारे में तो अपने देश के लोगों और अपनी सरकार को पता ही नहीं चल पाता होगा। इस तरह की सारी घटनाओं में कई पहलू सामान्य हैं। कामगार के तौर पर पराए मुल्क में जाने वाले लोग बहुत गरीब परिवारों और गरीब इलाकों के होते हैं। ये प्राय: कम पढ़े-लिखे होते हैं और दलालों या एजेंटों के झांसे में आते हैं। एजेंट उन्हें अच्छी आय, अच्छे रहन-सहन और कार्यस्थल पर सब तरह की सुविधा आदि का आश्वासन देकर लुभाते हैं। पर अंत में पता चलता है कि यह सब छलावा था।

वाजपेयी सरकार के समय से हर साल प्रवासी भारतीय सम्मेलन होता है। धनी देशों में बसे और वहां काम कर रहे धनी भारतवंशियों की खूब आवभगत होती है, उन्हें यहां निवेश के लिए न्योता जाता है। पर गरीब प्रवासियों की फिक्र कौन करे? उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत सरकार और क्वालालंपपुर स्थित भारतीय उच्चायोग झारखंडी मजदूरों को संकट से उबारने में तत्परता दिखाएंगे। पर मलेशिया में सांसत में पड़े झारखंडी मजदूरों की हालत एक और सवाल की तरफ इशारा करती है। अगर अपने ही देश में गुजारे लायक काम इन लोगों को मिल पाता, तो क्या ये पराए देश और पराए परिवेश में जाकर खटने को राजी होते? कभी-कभार के हलके-फुलके अपवाद को छोड़ दें, तो लंबे समय से भारत की विकास दर ऊंची रही है। पर इसने गरीबों को क्या दिया है? ऊंची विकास दर के बावजूद रोजगार के मोर्चे पर इतनी शोचनीय हालत क्यों है?