तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी के पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से वैसा ही तीखा विवाद रहा है जैसा पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज के पानी को लेकर। कर्नाटक और तमिलनाडु में कावेरी के पानी को लेकर आंदोलन भी खूब हुए हैं और चुनावी राजनीति भी। कावेरी का उद्गम कर्नाटक के कोडागु जिले में है और यह कर्नाटक से होकर तमिलनाडु, केरल और पुदुच्चेरी में भी बहती है। सात सौ पैंसठ किलोमीटर लंबी कावेरी नदी कर्नाटक और तमिलनाडु की जीवनरेखा कही जाती है। दोनों राज्यों के बीच जल आबंटन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पंचाट या अदालती फैसले को लागू कराना हमेशा मुश्किल बना रहा है। इसका अंदाजा ताजा फैसले के बाद बरती गई एहतियात से भी लगाया जा सकता है। फैसला आते ही दोनों राज्यों की सरकारों ने एक दूसरे की सीमा में जाने वाली बसें फिलहाल न चलाने की घोषणा कर दी। कावेरी पर सर्वोच्च अदालत का फैसला तमिलनाडु को थोड़ा मायूस करने वाला है, पर इसका स्वागत किया जाना चाहिए। कोई भी ऐसा निर्णय, जो दोनों राज्यों को पूरी तरह संतुष्ट कर सके, लगभग असंभव है।
अदालत ने तमिलनाडु के हिस्से का पानी थोड़ा-सा घटाया है, पर साथ ही केंद्र को कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड गठित करने को कहा है। बोर्ड का गठन होने से यह बराबर सुनिश्चित होता रहेगा कि तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी मिले, जो कि कर्नाटक के अड़ियल रवैये या आनाकानी के कारण प्राय: नहीं हो पाता है। इस तरह के नाजुक मसलों पर, जिन पर जन-भावनाएं फौरन भड़काई जा सकती हैं, अन्यायपूर्ण या अतिरंजित मांगों को आसानी से जन-समर्थन मिल जाता है। इसलिए राजनीतिक दलों के बीच बढ़-चढ़ कर मांग करने और उसे तूल देने की होड़ मची रहती और इसकी परिणति गतिरोध बने रहने में होती है जिससे किसी का भी भला नहीं होता। सर्वोच्च अदालत ने तमिलनाडु के हिस्से में सिर्फ 14.75 टीएमसी फीट की कमी की है, और इतनी ही बढ़ोतरी कर्नाटक के हिस्से में की है, बेंगलुरु और मैसुरु में पेयजल की कमी के मद््देनजर। ताजा फैसले के मुताबिक तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी पानी मिलेगा। केरल और पुदुच्चेरी का हिस्सा पहले जैसा ही, यानी क्रमश: तीस टीएमसी फीट और सात टीएमसी फीट रहेगा।
इस फैसले पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने संतोष जताया है, शायद उन्हें यह भी लगता हो कि राज्य में चुनावी माहौल के बीच आए इस फैसले से उन्हें सियासी फायदा मिल सकता है। पर विडंबना यह है कि राज्य सरकार ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल बंटवारा 1892 और 1924 में मैसूर राज्य और मद्रास प्रेसिडेंसी के बीच हुए समझौतों पर आधारित है, और चूंकि तब संविधान का वजूद नहीं था इसलिए अदालत को इस मामले में पड़ने का कोई अधिकार नहीं है! ताजा फैसले से केंद्र के रुख को भी झटका लगा है। केंद्र ने कावेरी जल प्रबंधन बोर्ड के गठन केतकाजे पर टालमटोल करते हुए कहा था कि अंतर-राज्य जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत जल बंटवारे की योजना बनाना संसद का काम है। जैसा कि फैसले से खुद जाहिर है, सर्वोच्च अदालत ने केंद्र की यह दलील स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा है कि ताजा फैसला पंद्रह साल के लिए है। अब केंद्र और कर्नाटक तथा तमिलनाडु की सरकारों को फैसले के सुचारु क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए। इससे देश में दूसरे नदी जल विवादों के भी समाधान का माहौल बनेगा।
