प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में स्कूलों और कॉलेजों के हजारों विद्यार्थियों को संबोधित किया, जिसका विषय था कैसे तनाव-मुक्त रह कर परीक्षा दें। पिछले लोकसभा चुनाव के समय ‘चाय पर चर्चा’ नामक उनके कार्यक्रमों की तर्ज पर इसे परीक्षा पर चर्चा भी कहा जा सकता है, या चाहें तो ‘मन की बात’ की तरह इसे परीक्षा की बात भी कह सकते हैं। इस संबोधन को टीवी और अन्य माध्यमों से सुनने वाले विद्यार्थियों की संख्या तो जोड़ दें, तो यह लाखों में रही होगी। यह संबोधन ऐसे वक्त हुआ, जब दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं आसन्न हैं। इसलिए विषय का महत्त्व स्वत: जाहिर है। यह आम अनुभव है कि परीक्षा को लेकर अधिकतर विद्यार्थी तनाव में रहते हैं। पता नहीं कौन-से प्रश्न आएंगे, पता नहीं कहां से पूछ लिया जाएगा, कितने अंक मिलेंगे, कैसा परिणाम आएगा, आदि चिंताएं उन्हें घेरे रहती हैं। लिहाजा, वे न तो परीक्षा की तैयारी के दौरान और न ही परीक्षा के दौरान सहज रह पाते हैं। प्रधानमंत्री ने इस सिलसिले में उन्हें दो नसीहतें दीं। एक तो यह कि वे प्रसन्न भाव से परीक्षा दें, इससे वे अच्छा कर पाएंगे। दूसरे, वे अपने अंदर आत्मविश्वास विकसित करें, और यही सफलता की बुनियाद है।
प्रधानमंत्री ने कई ऐसी बातें भी कहीं जो हमारी शिक्षा प्रणाली नहीं सिखाती। उन्होंने किसी और के जैसा बनने की कवायद करने के बजाय अपनी विशिष्टता पर ध्यान देने और उसे विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने अभिभावकों को भी हिदायत दी कि वे बच्चों पर अपनी महत्त्वाकांक्षा न लादें। उन्हें अपनी अधूरी इच्छाएं पूरी करने का जरिया न समझें। ये सब ऐसी बातें हैं जिन्हें दुनिया के महान शिक्षाविद और चिंतक कहते आए हैं। अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री भी इसी दिशा में सोचते हैं। लेकिन उन्होंने जो कुछ कहा है उस दिशा में शिक्षा प्रणाली को ले जाने की पहल कौन करेगा! अगर विद्यार्थी परीक्षा से पहले और परीक्षा के दौरान तनाव में रहते हैं, तो क्या यह उनकी वैयक्तिक कमजोरी का मामला है, या इसका ज्यादा संबंध शिक्षा व्यवस्था और मूल्यांकन प्रणाली से है? परीक्षा के बाद विद्यार्थी और अभिभावक दाखिले के तनाव में रहते हैं, क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत विषमतामूलक है। एक तरफ काफी प्रतिष्ठित समझे जाने वाले चुनिंदा कॉलेज हैं, और दूसरी तरफ, ऐसे कॉलेज जहां पढ़ाई-लिखाई के नाम पर विद्रूप है। उच्च शिक्षा के दायरे में आते ही या पढ़ाई पूरी करते ही नौकरी की चिंता घेर लेती है, जो कि स्वाभाविक है। लेकिन ऊंची विकास दर के बरक्स रोजगार-सृजन की गति बहुत धीमी है।
शिक्षा अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद से स्कूलों में नामांकन दर में तेजी आई है और अब बहुत कम बच्चे होंगे जो स्कूली शिक्षा की पहुंच से बाहर रह गए होंगे। लेकिन कैसी पढ़ाई-लिखाई हो रही है इसका अंदाजा गैरसरकारी संगठन ‘प्रथम’ की हर साल आने वाली रिपोर्ट से हो जाता है। ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा पर ‘प्रथम’ की ताजा रिपोर्ट भी विचलित करने वाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि चौदह से अठारह साल के अधिकांश बच्चे अपने से निचली कक्षाओं के लायक भी नहीं हैं। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि अधिकतर राज्यों में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के ढेर सारे पद खाली हैं। प्रशिक्षित शिक्षकों के बजाय ठेके पर शिक्षाकर्मी या शिक्षामित्र नियुक्त करने का चलन बढ़ा है, ताकि बहुत कम तनख्वाह देकर काम चलाया जा सके। उम्मीद की जाए कि प्रधानमंत्री इन बातों पर भी गौर करेंगे!

