भारतीय जनता पार्टी विजय रथ पर सवार है। पिछले कुछ समय से वह एक के बाद एक चुनाव जीत रही है। दिल्ली नगर निगम के चुनाव भी उसके खाते में गए। तीसरी बार लगातार वह एमसीडी पर काबिज हुई है। पिछली बार भाजपा के निगम पार्षदों के कामकाज को लेकर लोगों में असंतोष था, इसलिए माना जा रहा था कि इस बार के चुनाव में उसे शिकस्त खानी पड़ेगी। मगर पार्टी ने रणनीति बदली और सारे पुराने पार्षदों को बदल डाला। नए लोगों को मैदान में उतारा। इस तरह पुराने पार्षदों के प्रति लोगों के मन में जो गुस्सा था वह कम हो गया। मगर महज इस रणनीति के चलते उसे कामयाबी नहीं मिली। इस चुनाव में भी नरेंद्र मोदी के जादू ने काम किया। उधर आम आदमी पार्टी की नाकामियों और बड़बोलेपन ने मतदाता के मन को बदला। हालांकि दो साल पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी मोदी का जादू कायम था, पर अरविंद केजरीवाल उन पर भारी पड़े थे और सत्तर में से सड़सठ सीटें जीत कर अभूतपूर्व कामयाबी हासिल की थी। उनका वह जादू एमसीडी चुनाव में बिखर गया तो इसके पीछे केजरीवाल सरकार के कामकाज के तरीके को लेकर लोगों के मन में उपजा असंतोष बड़ा कारण साबित हुआ।
इस एमसीडी चुनाव से एक बार फिर यही सिद्ध हुआ कि अब राजनीति का स्वरूप बदल रहा है। मतदाता छोटे और क्षेत्रीय दलों पर भरोसा करने की बजाय बड़े दलों की तरफ देख रहे हैं। उनमें यह विश्वास ज्यादा गहरा बनता जा रहा है कि केंद्र और राज्यों से लेकर नगर निगमों तक में एक ही दल की सत्ता हो तो विकास कार्यों में गति आती है। हाल के पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजों से भी यही संकेत मिला। कुछ राज्यों में कांग्रेस की स्थिति थोड़ा सुधरती नजर आई, मगर अब भी वह इस हालत में नहीं आ पाई है कि मजबूत विकल्प बन सके। आम आदमी पार्टी से लोगों को जिस शुचिता और ईमानदारी की उम्मीद थी, उसे लेकर विश्वास पैदा हुआ था कि वह वैकल्पिक राजनीति का रास्ता तैयार करेगी, वैसा वह कर नहीं पाई। ऐसे में भाजपा को स्वाभाविक लाभ मिल रहा है।
चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत और खासकर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के कामकाज के तरीके से न सिर्फ भाजपा का मनोबल बढ़ा हुआ था, बल्कि मतदाता के मन पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। लोगों को विश्वास होने लगा है कि भाजपा अब राजनीति को एक नया स्वरूप दे रही है, कामकाज की संस्कृति को बढ़ावा दे रही है। मतदाता को काम दिखना चाहिए, सो मोदी के विकास के नारे का जादू लगातार बना हुआ है। इसी का नतीजा है कि पिछली तमाम नाकामियों और लोगों के असंतोष के बावजूद भाजपा ने रणनीति बदली और एमसीडी चुनाव में स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों से ढंकने में कामयाब रही। साफ-सफाई, स्वास्थ्य सेवाओं, निगमों में भ्रष्टाचार आदि का मुद्दा दब गया। मतदाता को लगा कि भाजपा भ्रष्टाचार के मामले में अपने लोगों को बचाने के बजाय उनसे पल्ला झाड़ने में भी देर नहीं लगाती। अब भाजपा दिल्ली नगर निगम पर काबिज हो गई है, पर चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। उसे अब अधिक सावधान रहना पड़ेगा कि जो पिछले कार्यकाल में हुआ, वह इस बार न होने पाए। नहीं तो दिल्ली के मतदाता का मन बदलते देर नहीं लगती। आम आदमी पार्टी के साथ उसका सलूक इसका उदाहरण है।
