सोमवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जहां लालू प्रसाद यादव की मुसीबत बढ़ाई है, वहीं बिहार सरकार और ‘महागठबंधन’ को भी सांसत में डाल दिया है। बहुचर्चित चारा घोटाला लालू की सबसे दुखती रग रहा है। उनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान चारे की खरीद काफी बढ़े हुए दाम पर की गई। यानी वास्तविक कीमत से ज्यादा भुगतान हुआ। फिर, कई मामलों में तो बिना खरीद के ही भुगतान हो गया। सीबीआइ के मुताबिक यह घोटाला कोई एक हजार करोड़ का था और 1990 से 1997 तक चला। घोटाले से जुड़े एक मामले में लालू को कुछ बरस पहले जेल जाना पड़ा। उन्हें पांच साल की सजा सुनाई गई थी। पर वे थोड़े ही दिन कैद में रहे। उन्हें जमानत मिल गई, और अभी वे जमानत पर ही हैं। चारा घोटाले के इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनके चुनाव लड़ने पर कानूनन पाबंदी लग गई। लेकिन वे अपनी पार्टी या राष्ट्रीय जनता दल का संचालन करते हुए राजनीति में पहले की ही तरह जमे रहे हैं। पर अब वे एक अपूर्व संकट में घिर गए हैं।
झारखंड हाइकोर्ट ने उन्हें एक मामले में दोषी मानते हुए आपराधिक साजिश रचने समेत बाकी सारे मामलों से बरी कर दिया था। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने लालू पर आपराधिक साजिश रचने का मामला चलाने का आदेश सीबीआइ को दे दिया है। यही नहीं, कार्यवाही को नौ महीनों के भीतर निपटाने को कहा है। सर्वोच्च अदालत के ताजा फैसले के बाद, स्वाभाविक ही, एक बार फिर चारा घोटाले को लेकर बिहार की राजनीति गरमा गई है। लालू तो संकट में घिरे ही हैं, बिहार की गठबंधन सरकार भी अचानक उनकी वजह से परेशानी में पड़ गई है। मुख्यमंत्री नीतीश की छवि साफ-सुथरी रही है, पर वे राजद के साथ सरकार चलाने को विवश हैं, जिसके विधायकों की संख्या महागठबंधन में सबसे ज्यादा है। और भी विडंबना यह है कि लालू पर आपराधिक साजिश का मामला ऐसे वक्त बहाल हुआ है जब उनके खिलाफ कुछ और आरोप भी चर्चा में हैं। पिछले दिनों, जेल में माफिया सरगना मोहम्मद शहाबुद््दीन से फोन पर उनकी बातचीत का खुलासा एक टीवी चैनल ने किया। इस बातचीत में शहाबुद््दीन ने अपनी शिकायतें गिनाई हैं, जिनमें एक पुलिस अधीक्षक का ‘अनपेक्षित’ व्यवहार भी शामिल है। शहाबुद््दीन को पार्टी में शामिल करने के कारण राजद को पहले ही काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी, ताजा खुलासे से लालू और राजद की छवि और भी दागदार हो गई है। रही-सही कसर मिट््टी घोटाले और लालू के बेटों पर बिहार में अवैध तरीकों से बेशकीमती जमीन-जायदाद हासिल करने के आरोपों ने पूरी कर दी है। लालू के दो बेटों में एक उपमुख्यमंत्री है और एक कैबिनेट मंत्री।
जाहिर है, नीतीश सरकार के सामने साख का ऐसा संकट पहले कभी नहीं आया था। पर इस प्रकरण का असर बिहार से आगे, किसी हद तक राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। लालू धुर भाजपा-विरोध के लिए जाने जाते रहे हैं और भाजपा के खिलाफ अन्य दलों को एकजुट करने की अगर तनिक भी गुंजाइश दिखाई दी तो उन्होंने कोशिश करने का मौका कभी नहीं छोड़ा। खुद 2015 के बिहार विधानसभा के चुनाव में उन्होंने लंबे समय से अपने प्रतिद्वंद्वी रहे नीतीश कुमार से हाथ मिलाया और राज्य की सत्ता में आने की उम्मीद पाले भाजपा को विपक्ष में बैठने को मजबूर होना पड़ा। बिहार की तर्ज पर, भाजपा की बाढ़ को रोकने के लिए अगले लोकसभा चुनाव में सारे विपक्षी दलों को एकजुट कर महागठबंधन या महा मोर्चा बनाने की गुफ्तगू शुरू हो गई थी और राष्ट्रपति चुनाव में इसके प्रयोग की सुगबुगाहट भी। पर लालू के खिलाफ अदालती फैसले ने सारे विपक्ष को सकते में डाल दिया है।
