हरियाणा में सत्ता की कमान भाजपा के हाथ में आने के बाद यह उम्मीद बंधाई गई थी कि महिलाओं और कमजोर तबकों के लोगों के जीवन में भी बदलाव आएगा और वे खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे। लेकिन हकीकत क्या है, यह बीते डेढ़-दो साल के अपराध के आंकड़ों से जाहिर है। अब तो और भी बुरा हाल है। पिछले एक हफ्ते के दौरान हरियाणा में सामूहिक बलात्कार की दो घटनाओं ने फिर इस सवाल पर सोचने पर मजबूर किया है कि महिलाओं के खिलाफ काफी समय से लगातार कायम हिंसा को रोक पाने में राज्य सरकार क्यों विफल साबित हो रही है। सोनीपत में तेईस साल की एक युवती के साथ जिस तरह की बर्बरता हुई, उसने 16 दिसंबर, 2012 की उस घटना की याद ताजा कर ही, जब दिल्ली में चलती बस में एक मेडिकल छात्रा को सामूहिक बलात्कार और वीभत्स हिंसा का शिकार होना पड़ा था और आखिर उसकी मौत हो गई। सोनीपत में भी उसी तरह पहले सामूहिक बलात्कार किया गया, फिर बेहद क्रूरतापूर्वक पत्थरों से पीड़ित युवती के चेहरे को कुचला गया, उसके निजी अंगों को सरिया से क्षत-विक्षत कर दिया गया। दूसरी घटना में गुरुग्राम जैसे हाइटेक और प्रशासनिक रूप से चाक-चौबंद शहर में बाईस साल की एक युवती का रात में सड़क पर अपहरण करके सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर उसे दिल्ली में फेंक दिया गया।

हरियाणा में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों के मामले में पुलिस की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सोनीपत में जिस युवती के साथ बर्बरता हुई, वह और उसके परिवार ने गिरफ्तार मुख्य आरोपी के बारे में तकरीबन एक महीने पहले पुलिस से शिकायत की थी कि वह उससे छेड़छाड़ कर रहा है। लेकिन अब पुलिस ने विचित्र सफाई पेश की है कि उस समय केवल मौखिक शिकायत की गई थी। सवाल है कि किसी अपराध की गंभीरता क्या मौखिक रूप से बताए जाने पर कम या गौण हो जाती है? पुलिस को तुरंत कार्रवाई करना जरूरी क्यों नहीं लगा? क्या अपराध हो जाने के बाद ही पुलिस की ड्यूटी शुरू होती है? हालत यह है कि युवती के शव को पुलिस ने पीजीआइएमएस में ‘अज्ञात आदमी’ बताया। यही नहीं, कोई जांच होने से पहले ही, भूख को उसकी मौत की वजह दर्ज करा दी। जहां पुलिस महकमे के काम करने का यह तरीका हो, वहां अपराधियों का हौसला बढ़ना स्वाभाविक है। सोनीपत और गुरुग्राम में हुए कांड इसके उदाहरण भर हैं।

एक समस्या यह है कि पुलिस और प्रशासन तभी सक्रिय होते हैं, जब किसी मामले की खबर आम जनता के बीच पहुंचती है और आक्रोश व्यापक स्तर पर फैलने लगता है। दिल्ली में सोलह दिसंबर, 2012 की घटना के बाद जिस तरह की सामाजिक प्रतिक्रिया हुई थी, वैसी दूरदराज में हुई उसी तरह की घटना पर नहीं दिखाई देती है। यही वजह है कि ढेर सारे मामलों में सरकार उदासीन और पुलिस निष्क्रिय नजर आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की शुरुआत हरियाणा के पानीपत से की थी। लेकिन हरियाणा में बेटियां कितनी सुरक्षित हैं?