प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही अपनी विदेश नीति में चीन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही थी। तब चीन ने भी उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया जताई थी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आगमन के साथ आपसी रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की साझी आकांक्षा प्रतिबिंबित हुई थी। लेकिन धीरे-धीरे वह जोश ठंडा पड़ गया। यह खासकर दो वजहों से हुआ। एक तो चीन की तरफ से जब-तब सीमा संबंधी अतिक्रमण के कारण।
और दूसरे, कई मामलों में चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी के चलते। और अब स्थिति यह है कि दोनों पक्ष एक नई विश्व-व्यवस्था के लिए साझी दृष्टि पेश करने के बजाय अपनी चिंताओं का एक दूसरे से खयाल रखने का आग्रह कर रहे हैं। यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन दौरे का सबब जी-20 और ब्रिक्स की शिखर बैठकों में शिरकत करना था। पर इन बैठकों से अलग चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी द्विपक्षीय वार्ता का महत्त्व कम नहीं है। जिनपिंग से यह उनकी आठवीं मुलाकात थी। तीन महीने से भी कम समय में वे दूसरी बार मिले। पहली भेंट की गर्मजोशी की जगह अब कूटनीतिक संदेश देना और सावधानी बरतना ज्यादा अहम मालूम पड़ता है। इस मौके पर मोदी ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से ‘क्षेत्र से पैदा होने वाले आतंकवाद’ पर जिनपिंग के समक्ष अपनी चिंता जताई। यह भी कहा कि दोनों देशों को एक दूसरे के रणनीतिक हितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी? इसलिए कि चीन कई बार भारत के रणनीतिक हितों के आड़े आ जाता है। मसलन, एनएसजी की सदस्यता पाने का भारत का प्रयास चीन के विपरीत रुख की वजह से नाकाम हो गया।
जिनपिंग से अपनी बातचीत के दौरान और फिर ब्रिक्स की बैठक को संबोधित करते हुए भी मोदी ने आतंकवाद का मुद््दा प्रमुखता से उठाया और दो बातों पर जोर दिया। एक यह कि आतंकवादी संगठनों के पास न कोई बैंक है न हथियार का कारखाना; जाहिर है उन्हें दूसरों से ही वित्तीय और हथियारी मदद मिलती है। आतंकवाद के मददगारों और सरपरस्तों को अलग-थलग किया जाना चाहिए। दूसरी बात उन्होंने यह कही कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ‘राजनीतिक हितों’ से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। कहना न होगा कि पहली बात साफ तौर पर पाकिस्तान की तरफ इशारा करती है और दूसरी बात विशेष रूप से चीन की तरफ।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता दोहराने में चीन कभी पीछे नहीं रहा। लेकिन पठानकोट हमले को अंजाम देने वाले जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित सूची में डालने का प्रस्ताव जब संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद विरोधी समिति की तरफ से आया, तो चीन की अड़ंगेबाजी की वजह से वह पारित नहीं हो सका। चीन ने ऐसा इसीलिए किया होगा कि वह पाकिस्तान को नाराज नहीं करना चाहता था। बलूचिस्तान-बल्तिस्तान और पीओके से होकर शिनजियांगके काशगर तक आर्थिक गलियारा बनाने तथा इन इलाकों के तेल और गैस के दोहन की छूट देकर पाकिस्तान ने चीन को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन पाकिस्तान की मुश्किल यह है कि ये इलाके जन-असंतोष से खदबदा रहे हैं। शी से अपनी बातचीत में मोदी ने इस गलियारे का मुद््दा भी उठाया। यह चीन को रास नहीं आया होगा। लेकिन चीन पहुंचने से पहले विएतनाम जाकर मोदी ने पहले ही जता दिया था कि वे चीन की नाराजगी की परवाह नहीं करेंगे।
