चंडीगढ़ में हाल ही में एक युवती का पीछा और छेड़छाड़ के मामले से जब वहां महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे तो राज्य सरकार ने शुरू में उसे बहुत तवज्जो नहीं दी। जब मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया तब जाकर आरोपी की गिरफ्तारी हुई, लेकिन व्यवस्था के स्तर पर किसी ठोस बदलाव की पहल नहीं दिखी। उसके कुछ ही दिन बाद गुरुग्राम में एक युवती के साथ उसी तरह की घटना हुई और वह भी किसी तरह बच सकी। अब स्वतंत्रता दिवस पर दिनदहाड़े हथियार दिखा कर एक नाबालिग बच्ची के अपहरण और बलात्कार की घटना से साफ है कि सरकार की नजर में महिलाओं की सुरक्षा के सवाल की क्या जगह है। यह घटना तब हुई जब स्वतंत्रता दिवस के मद्देनजर चारों तरफ सुरक्षा-व्यवस्था आम दिनों के मुकाबले ज्यादा चाक-चौबंद रहती है। लेकिन चंडीगढ़ के हृदयक्षेत्र में स्थित सेक्टर तेईस के चिल्ड्रेन टैÑफिक पार्क के रास्ते से होते हुए स्कूल में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के समारोह में हिस्सा लेने जा रही बच्ची के साथ बलात्कार तो जैसे दरिंदगी की इंतिहा है। इसके एक दिन पहले चंडीगढ़ में ही कार में सवार तीन लड़कों ने एक लड़की का पीछा किया था। उधर दिल्ली में एक नर्स को अगवा कर उसके साथ बलात्कार की घटना सामने आई है।
यानी एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें स्वतंत्रता दिवस के दिन महिलाओं के सुरक्षित और सहज जीवन के अधिकार को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही थीं और इसी दिन चंडीगढ़ में एक बच्ची और दिल्ली में एक नर्स बलात्कारियों का शिकार बनीं। इन घटनाओं से फिर यही साबित हुआ है कि दिल्ली के अलावा सुरक्षा-व्यवस्था के लिहाज से बेहतर माना जाने वाला शहर चंडीगढ़ भी अब महिलाओं के लिए महफूज नहीं है। हालत यह है कि एक ओर देर रात को अपने सुरक्षित वाहन में जा रही युवती का पीछा किया जाता है और वह किसी तरह बच पाती है तो दूसरी ओर दिनदहाड़े एक बच्ची का चाकू की नोक पर बलात्कार किया जाता है। किसी आपराधिक घटना का सबक यह होना चाहिए कि उस तरह के अगले मौके नहीं आने देने के सारे इंतजाम किए जाएं। लेकिन पिछले कुछ दिनों के भीतर महिलाओं के खिलाफ कई आपराधिक वारदात के बाद सवालों के घेरे में आई हरियाणा सरकार और वहां की पुलिस की नजर में शायद यह कोई चिंता की बात नहीं है।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस हरियाणा से ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के नारे साथ इस कार्यक्रम की शुरुआत की थी, वहां आज महिलाओं के लिए हालात दिनोंदिन खराब होते जा रहे हैं। उस बच्ची के लिए ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे क्या मतलब रह गया जो स्कूल में आयोजित स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हिस्सा लेने खुशी-खुशी जा रही थी, लेकिन बलात्कार जैसे खौफनाक अपराध का शिकार हो गई! दरअसल, पिछले कुछ सालों से सरकारों ने जिस उत्साह के साथ महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाने की बातें की हैं, उसी शिद्दत से उन पर अमल करने की जरूरत उन्होंने महसूस नहीं की है। वरना क्या वजह है कि दिल्ली, चंडीगढ़ या गुरुग्राम जैसे सुव्यवस्थित और सुरक्षित माने जाने वाले शहरों में न केवल रात में, बल्कि दिन में भी अपराधी बिना किसी हिचक के अपराध को अंजाम दे रहे हैं और महिलाओं के लिए रास्ते और सड़कें खौफ से भर गई हैं। आखिर आंकड़ों की कसौटी पर विकास की चकाचौंध परोसती सरकारों की नजर में महिलाओं की सुरक्षा का सवाल कहां है? विकास के दावों के बीच वह दौर कब आएगा जब महिलाएं घर के भीतर या बाहर खुद को सुरक्षित और सहज महसूस कर पाएंगी?

