पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन ने रविवार को कहा कि पशु बाजार के नियमन संबंधी अधिसूचना सरकार के लिए कोई प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है और वह उठाई गई सारी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करने को राजी है। इससे पहले शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने भी कहा था कि अधिसूचना को लेकर सरकार का रवैया हठधर्मिता का नहीं है, वह समीक्षा के लिए तैयार हो सकती है। तो क्या केंद्र को अब अधिसूचना की असंगतियों का भी अहसास हो रहा है और उसे लागू करने की कठिनाइयों का भी! पर इनका अंदाजा अधिसूचना जारी करने से पहले क्यों नहीं हो सका था? कहीं ऐसा तो नहीं कि विवाद उठने देने में ही उस वक्त फायदा दिखा हो, और अब पुनर्विचार की बात इसलिए कही जा रही है कि लाभ के बजाय नुकसान ज्यादा होने का डर सता रहा है? खुद भाजपा के भीतर अधिसूचना को लेकर एक राय नहीं है। पूर्वोत्तर में पार्टी के भीतर से भी अधिसूचना के तीखे विरोध के साथ उसे वापस लेने की मांग उठी है। भाजपा के ही, अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने तो अधिसूचना की निंदा करते हुए यह तक कहा है कि वे बीफ खाते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मेघालय में भाजपा के एक नेता ने विरोध में पार्टी ही छोड़ दी।
अरुणाचल से पहले केरल, मिजोरम और बंगाल की सरकारें विरोध जताते हुए अधिसूचना को लागू न करने का एलान कर चुकी हैं। विरोध-प्रदर्शन तमिलनाडु में भी हुए हैं। इस सब से केंद्र को लगा होगा कि नाहक लेने के देने न पड़ जाएं। देश के अधिकतर बड़े राज्यों में गोवध निषेध का कानून लागू है। यही नहीं, गोरक्षा से जुड़ी सियासत के कारण इन कानूनों को और सख्त बनाने की होड़-सी चल रही है। मसलन, भाजपा की गुजरात सरकार ने गोवध पर सजा बढ़ा कर आजीवन कारावास कर दी है। पर भाजपा को इतने से संतोष नहीं हुआ कि उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत में गोवध के खिलाफ कड़े कानून हैं। इसलिए पशु बाजारों के नियमन के बहाने बाकी राज्यों पर भी अपना एजेंडा थोपने की कोशिश की गई। इस चक्कर में यह भी भुला दिया गया कि पशुओं की खरीद-बिक्री राज्य का विषय है। अधिसूचना जारी होते ही विरोध की आवाज उठी। एक तो मांस के कारोबार से जुड़े लोगों की तरफ से। फिर पूर्वोत्तर, बंगाल और केरल जैसे राज्यों की सरकारों की तरफ से। तीसरे, उन लोगों की तरफ से भी एतराज आए जो पशुओं की खरीद-बिक्री में ढेर सारी शर्तें थोपने से नाराज थे।
कितनी ज्यादा कानूनी औपचारिकता थोपी गई है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गाय, बछड़ा, बछिया, बैल, सांड, भैंस, ऊंट जैसे पशुओं के मामले में खरीदार को अपना पहचानपत्र व पते का प्रमाणपत्र पेश करना होगा, लिखित गांरटी देनी होगी कि कृषिकार्य या दूध के लिए ही उसने संबंधित पशु की खरीद की है, छह महीने तक वह किसी और को यह पशु नहीं बेच सकेगा, खरीद-फरोख्त का कागज जिले के स्थानीय राजस्व अधिकारी, जिले के पशु चिकित्सा अधिकारी और पशु कल्याण समिति के सचिव को दिखाना होगा, आदि। कहना न होगा कि ढेर सारे नियम पशुओं की खरीद-बिक्री को काफी मुश्किल बना दे सकते हैं। अधिसूचना की कानूनी वैधता को भी चुनौती मिली है, और मद्रास हाइकोर्ट ने उस पर फिलहाल रोक लगा दी है। हैरानी की बात है कि पर्यावरण मंत्रालय न तो कानूनी और न राजनीतिक मुश्किलें समझ सका, न दूसरी व्यावहारिक कठिनाइयां।
