समाजवादी पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई में अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग का मुहावरा चरितार्थ हो रहा है। चार महीने पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच सत्ता की धुरी बनने की जो होड़ शुरू हुई थी, वह तमाम सुलह-सफाई के बावजूद नए-नए रंग-रूप में दिखाई पड़ रही है। ताजा मामले में शिवपाल यादव और अखिलेश यादव यानी चाचा-भतीजे में टिकट बंटवारे के सवाल पर जंग तेज होती दिख रही है। उत्तर प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनाव के मद््देनजर शिवपाल यादव ने 175 उम्मीदवारों की घोषणा की थी, जिनमें अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और अमनमणि त्रिपाठी जैसे कई ऐसे नाम हैं जिनकी छवि पार्टी को नुकसान ही पहुंचा सकती है। इससे इतर अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष और अपने पिता मुलायम सिंह यादव को 403 विधानसभा सीटों के लिए प्रत्याशियों की अपनी एक अलग सूची सौंपी है। अखिलेश की सूची के बारे में यह कहा जा रहा है कि उन्होंने बेदाग छवि के लोगों को मैदान में उतारने की सिफारिश की है। इस सूची के सौंपते ही शिवपाल यादव सक्रिय हो गए और उन्होंने ट्वीट करके कहा, जिताऊ उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जाएगा; अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उनकी इस प्रतिक्रिया को अखिलेश यादव के लिए इशारा माना जा रहा है।

आपसी कलह के बीज सितंबर में तब दिखाई दिए, जब सपा में मुख्तार अंसारी की पार्टी के विलय की घोषणा शिवपाल यादव ने की थी। इस पर अखिलेश ने एतराज किया था। तब से लेकर आज तक पार्टी के भीतर तमाम तरह की उखाड़-पछाड़ हो चुकी है। शिवपाल मंत्रिमंडल से बाहर हो चुके हैं तो अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष का पद गंवाना पड़ा है। फिलहाल, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के तौर पर दो शक्ति-केंद्र स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। इसके ऊपर मुलायम सिंह यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर कभी अभिभावक की मुद्रा में नजर आते हैं तो कभी एक लाचार नेता के तौर पर। वे बराबर ‘सब कुछ ठीक’ होने का दावा करते हैं और तभी कोई नया बखेड़ा शुरू हो जाता है। साफ है कि प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच समझौते की कोशिशें महज दिखावा हैं। तलवारें अंदरखाने तनी हुई हैं। दोनों की इच्छा यही है कि उनके अपने समर्थक विधायक ज्यादा से ज्यादा जीतकर आएं, ताकि शक्तिपरीक्षण में कोई किसी ने कम न दिखे। इसके अलावा, अखिलेश यादव एक संदेश भी देना चाहते हैं कि वे साफ छवि के लोगों के हिमायती हैं। अगर चुनाव के बाद शिवपाल यादव के उम्मीदवार हारते हैं तो अखिलेश के पास कहने को यह बात रहेगी कि उनकी सुनी गई होती तो पार्टी की हालत कुछ और होती।

ऐसे में, सबसे असहज स्थिति मुलायम सिंह यादव की है। हालांकि परिवारवाद का यह रोग भी उन्हीं का पनपाया हुआ है। अब वे खुद अपने ही बुने जाल में जैसे उलझते जा रहे हैं। भाई की सुनें कि बेटे की! पार्टी के प्रदेश मुखिया की सुनें कि सरकार के मुखिया की! स्वाभाविक है कि संतुलन बनाने की ही कोशिश वे करेंगे। लेकिन इस खींचतान और रस्साकशी से जो संदेश बाहर जा रहा है, वह पार्टी के लिए किसी भी तरह शुभ नहीं है।