उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का अंदरूनी कलह अब सतह पर आ गया है। यों मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के बीच अमर सिंह और शिवपाल यादव की गतिविधियों को लेकर मतभेद काफी समय से चल रहे थे, पर विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर यह आर-पार की लड़ाई के रूप में सामने आ गया। पिछले हफ्ते मुलायम सिंह ने टिकट बंटवारे में कुछ ऐसे नेताओं को किनारे कर दिया, जो अखिलेश यादव के करीबी थे। यह अखिलेश यादव को नागवार गुजरा और उन्होंने अपने दम पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। तब अखिलेश और रामगोपाल यादव को पार्टी से निष्काषित कर दिया गया। फिर नाटकीय ढंग से उन दोनों का निष्कासन वापस ले लिया गया। उसके अगले ही दिन यानी रविवार को पार्टी का अधिवेशन बुला कर सर्वसम्मति से मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा कर उसकी जिम्मेदारी अखिलेश यादव को सौंप दी गई। अमर सिंह और शिवपाल यादव को भी पार्टी से अलग कर दिया गया। इस फैसले को मुलायम सिंह ने असंवैधानिक करार देते हुए पांच जनवरी को पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया है। इस घटनाक्रम से पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक दो गुटों में बंट गए हैं।
अब पांच जनवरी के अधिवेशन में जो भी फैसला हो, इस तमाम घटनाक्रम से पार्टी का जनाधार कमजोर हुआ है। निसंदेह अखिलेश यादव के कार्यकाल में उल्लेखनीय विकास कार्य हुए हैं और एक लोकप्रिय नेता के रूप में वे उभरे हैं। उनके प्रति लोगों में यह भी धारणा बनी है कि वे भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों से दूरी बना कर रखते हैं। इससे लग रहा था कि अगले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को लाभ मिलेगा। इस बीच नोटबंदी से लोगों में उभरी नाराजगी का भी उसे लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी, मगर पार्टी के अंदरूनी कलह की वजह से अब मुद्दे बदलने लगे हैं। समाजवादी पार्टी की मुश्किल यह है कि उसे विधानसभा चुनावों में अखिलेश सरकार की उपलब्धियों के साथ उतरने से ही लाभ मिल सकेगा। उधर अखिलेश यादव की मुश्किल यह है कि वे पार्टी से अलग होकर सिर्फ अपनी उपलब्धियां गिना कर मतदाताओं को अपने पक्ष में नहीं कर सकते।
उत्तर प्रदेश में पार्टियों का आधार काफी कुछ जातीय समीकरण पर टिका हुआ है। समाजवादी पार्टी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुट होने के नारे पर मुसलमानों को अपने पाले में करने में सफल रही है। अगर पार्टी दो फाड़ होती है, तो मतदाता भ्रम की स्थिति में होंगे और उसका लाभ दूसरी पार्टियों को मिलने की गुंजाइश बनेगी। अखिलेश यादव की कांग्रेस से निकटता और तालमेल के कयास लगाए जा रहे थे। फिर भी पार्टी टूटने की स्थिति में कांग्रेस की वजह से भले मुसलमान किसी एक धड़े से जुड़ जाएं, पर यादव वोट में बंटवारे की वजह से कोई भी धड़ा मजबूत स्थिति में नहीं रह पाएगा। इतना कुछ हो जाने के बाद भी अगर किसी समझौते की गुंजाइश बनती है और दोनों धड़ों में सुलह हो जाता है, तब भी इस घटनाक्रम से पार्टी को जितना नुकसान होना था, वह हो चुका। चुनाव के दिन अब बहुत कम रह गए हैं और इतने दिनों में उस नुकसान की भरपाई कर पाना पार्टी के लिए मुश्किल होगा। निश्चित रूप से इसका लाभ भाजपा को मिलेगा। विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली शिकस्त से उसमें पैदा हुआ कलह और बढ़ेगा ही।

