आखिरकार विपक्ष ने राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता में हुई सत्रह विपक्षी दलों की बैठक में मीरा कुमार के नाम पर सर्वसम्मति बनी। मोदी और शाह ने रामनाथ कोविंद के रूप में दलित प्रत्याशी उतार कर विपक्ष को चकरा दिया था। यह भी कहा जा सकता है कि इससे विपक्ष अचानक बचाव की मुद्रा में आ गया। कोविंद की उम्मीदवारी के जरिए भाजपा ने जो दांव चला उसकी काट के लिए मीरा कुमार से बेहतर चयन और क्या हो सकता था! मीरा कुमार भी दलित हैं। कोविंद बिहार के गवर्नर रह चुके हैं तो मीरा कुमार का नाता बिहार से और भी गहरा है। लंबे समय तक देश के शीर्ष दलित नेता रहे जगजीवन राम की बेटी मारी कुमार नौकरशाही से राजनीति में आर्इं, सासाराम से सांसद रहीं और पंद्रहवीं लोकसभा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। इस तरह उन्हें प्रशासन, सार्वजनिक कार्य और विधायी कार्य, सबका विशद ज्ञान व अनुभव है। लेकिन उन्हें अपना उम्मीदवार बनाने में विपक्ष ने देर कर दी। अगर मीरा कुमार का नाम पहले सामने आता, तब भी उनके जीत पाने की संभावना बहुत कम रहती, क्योंकि संख्याबल राजग की तरफ है। लेकिन तब राष्ट्रपति पद के लिए दलित दावेदारी की पहल का श्रेय विपक्ष को जाता।

पहले कोविंद का नाम सामने कर मोदी-शाह ने बाजी मार ली। यही नहीं, वे पूरे विपक्ष को एकजुट न होने देने में भी सफल हो गए। वाइएसआर कांग्रेस ने तो पहले से ही राजग के उम्मीदवार का समर्थन करने का वादा कर रखा था, कोविंद का नाम सामने आने के बाद बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, अन्नाद्रमुक और यहां तक कि जनता दल (यू) ने भी अपना समर्थन घोषित कर दिया, जो बिहार में कांग्रेस तथा राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से सरकार चला रहा है। शिव सेना ने भी शुरुआती ना-नुकर के बाद कोविंद के नाम पर हामी भर दी। जाहिर है, वोटों के गणित में कोविंद का पलड़ा भारी दिख रहा है। प्रकाश आंबेडकर का सुझाव था कि अगर विपक्ष आदिवासी उम्मीदवार उतारे, तो यह कहीं बेहतर रणनीतिक फैसला होगा, क्योंकि सारे दलों में आदिवासी विधायक हैं और हो सकता है कि राजग के कुछ वोट झटके जा सकें। मालूम नहीं, इस सुझाव पर विपक्षी दलों की क्या राय थी। पर मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाने वाले दलों ने अपना संदेश दे दिया है कि हम भी इस बार एक दलित को राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं, कोविंद को हमने आरएसएस की पृष्ठभूमि का होने के कारण स्वीकार नहीं किया।

फिर मीरा कुमार दलित तो हैं ही, महिला भी हैं। इस तरह सामाजिक प्रतीक के लिहाज से देखें, तो वे कोविंद से बीस पड़ती हैं। पर राजग की तरफ से कोविंद की उम्मीदवारी घोषित हो जाने के दो दिन बाद मीरा कुमार का नाम सामने आने से विपक्ष के फैसले को प्रतिक्रिया की तरह अधिक देखा जा रहा है। क्या अब मायावती की दुविधा खत्म होगी और वे विपक्ष की उम्मीदवार का साथ देंगी, और नीतीश कुमार अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगे? जो हो, यह एक ऐसा मुकाबला है जिसमें लोगों को अनुमान है कि नतीजा क्या होगा। पर अगर कोविंद की झोली में राजग के वोटों से ज्यादा वोट आए, तो इसे विपक्ष की कमजोरी के रूप में ही देखा जाएगा।