वह अपने आप में विचित्र और अफसोसनाक है कि जिस शहर को पिछले कई वर्षों से देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा मिल रहा हो, वहां दूषित पेयजल के सेवन से लोगों के मरने की खबरें आती हैं। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हो गई और करीब दो सौ लोगों को अस्पताल भर्ती होना पड़ा। खबरों के मुताबिक, भागीरथपुरा में नर्मदा नदी की पाइपलाइन में गंदा पानी मिल गया, जिससे पानी दूषित हो गया। लोगों ने इस पानी का सेवन शायद इसलिए भी कर लिया कि साफ और गंदे पानी में फर्क करना मुश्किल हो गया था।

सवाल है कि अगर आम लोग पेयजल के लिए पानी की आपूर्ति पर निर्भर हों, तो उनके पास गंदा और दूषित पानी पहुंचने की जिम्मेदारी किसकी है। लोगों की मौत के मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार ने गलती मानते हुए आनन-फानन में कुछ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही, लेकिन यह साफ है कि संबंधित महकमों की नींद तभी खुलती है, जब कोई बड़ा नुकसान हो चुका होता है।

यों, देश भर में लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है, लेकिन ऐसा लगता है कि आम लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है और इस क्रम में उनकी सेहत के साथ क्या होता है, इसकी परवाह शायद किसी को नहीं है। खबरों के मुताबिक, दूषित पेयजल की मार से प्रभावित इलाके में स्थानीय लोगों ने पिछले डेढ़ वर्ष से इससे होने वाली परेशानी और शिकायत के बावजूद सुनवाई न होने की बात कही। मगर सरकार के कामकाज की शैली का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पेयजल में दूषित पानी मिलने के बाद जब लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी, तब भी अगले कई दिन तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया।

इसके अलावा, पीने के पानी के पाइप लाइन से अलग गंदे पानी के निकासी की लाइन को सुरक्षित मानकों तक दूर रखने की व्यवस्था नहीं की गई, तो इसकी क्या वजह हो सकती है? क्या यह सिर्फ अक्षम अधिकारियों की अदूरदर्शिता का मामला है या फिर जानबूझ कर की गई अनदेखी का? इस तरह की लापरवाही का इलाज सिर्फ कुछ औपचारिक कदम नहीं हैं, बल्कि इसके लिए सभी स्तर पर सजगता और जिम्मेदारी की जरूरत है।

विडंबना यह है कि सरकार का मकसद प्रचार के लिए किसी शहर की स्वच्छता के तमगे हासिल करना रह गया लगता है। सबसे स्वच्छ शहर कहे जाने वाले इंदौर में अगर कुछ लोगों को जहरीला पानी पीने पर मजबूर होना पड़ा, तो इस विरोधाभासी हकीकत की पड़ताल करने की जरूरत है कि ऐसे तमगे जारी किए जाने के पैमाने क्या हैं? पीने का पानी सबसे बुनियादी जरूरत है, जिसके बिना ज्यादा वक्त तक नहीं रहा जा सकता।

सरकार देश भर में हर घर नल से जल पहुंचाने की योजना के तहत सबको स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने का दावा करती है। मगर इस दावे की हकीकत अक्सर सामने आती रहती है, जब किसी इलाके में भूजल सूख जाने तो कहीं पीने के पानी के लिए लोगों के जद्दोजहद करने की खबरें आती हैं। जहां पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था है भी, अगर वहां यह सेहत पर जोखिम से लेकर जानलेवा होने तक के खतरे से बची नहीं है, तो इसे कैसे देखा जाएगा। यह समझना मुश्किल है कि कमियों पर ध्यान देने और पेयजल के पाइप लाइन के सुरक्षित होने की निगरानी नियमित जवाबदेही में शामिल क्यों नहीं होती, ताकि ऐसी त्रासदी से बचा जा सके।