अंतरिक्ष अब कुतूहल का विषय नहीं, बल्कि कारोबारी संभावनाओं के अनंत आकाश में तब्दील हो चुका है। इसीलिए दुनिया के तमाम उन्नत देश अंतरिक्ष में अपनी पहचान अंकित करने की होड़ में नजर आते हैं। भारत भी पिछले कुछ वर्षों से अपने तकनीकी विकास, अनुसंधान क्षमता और प्रणाली के बल पर अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी देशों की कतार में शामिल हो गया है। उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार में तो वह दुनिया के कई देशों को चुनौती देने लगा है। अब भारत अपनी महत्त्वाकांक्षी गगनयान योजना पर काम कर रहा है। उस दिशा में एक बड़ी कामयाबी हासिल हुई है।

अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजंसी नासा ने एक्सिओम मिशन-4 के तहत जिन चार अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजा है, उनमें भारतीय वायुसेना के कप्तान शुभांशु शुक्ल भी शामिल हैं। शुभांशु को खासतौर पर गगनयान मिशन की दृष्टि से ही तैयार किया गया था। वे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंच कर सात प्रयोग करेंगे। यह भारत के लिए इसलिए भी बड़ी उपलब्धि है कि लंबे समय बाद उसका तैयार किया हुआ कोई अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में गया है। राकेश शर्मा के बाद शुभांशु को दूसरे भारतीय अंतरिक्ष यात्री का गौरव प्राप्त हुआ है।

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अंतरिक्ष में मानव को भेजना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उन्नत अंतरिक्ष यानों, ताकतवर कैमरों, रोबोटिक यंत्रों आदि के विकास के बावजूद अंतरिक्ष के विस्तार को पूरी तरह खंगाल पाना संभव नहीं है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किया गया, ताकि वहां रह कर अंतरिक्ष यात्री विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन कर सकें। मगर उस स्टेशन तक मानव को भेजना और वापस लाना अब भी बड़ी चुनौती है। सुनीता विलियम्स के वहां लंबे समय तक फंस जाने की घटना से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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जिन यात्रियों को वहां भेजा जाता है, उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से विशेष प्रशिक्षण की जरूरत होती है, क्योंकि अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के लिए जिस तरह शरीर को ढालने की जरूरत होती है, वह कम ही लोग कर पाते हैं। फिर, उस स्टेशन तक यात्रियों को भेजने के लिए भरोसेमंद यान अभी तक अमेरिका ही विकसित कर पाया है। शुभांशु के अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर जाने से भारत को अपने अंतरिक्ष यात्री तैयार करने का रास्ता खुलेगा और गगनयान मिशन के लिए काम करने में काफी मदद मिलेगी।

अंतरिक्ष के बहुत सारे रहस्य अभी खुलने बाकी हैं। उसका अध्ययन केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उसमें जीवन की संभावनाओं की तलाश हो सकेगी। विभिन्न ग्रहों पर खनिजों और नए तत्त्वों की खोज से विज्ञान व मानवता के लिए नए रास्ते भी खुल सकेंगे। भविष्य में धरती के कई खनिज बढ़ती जरूरतों के आगे अपर्याप्त पड़ सकते हैं। इसलिए दूसरे ग्रहों पर उनकी तलाश अभी से करनी पड़ेगी। फिर, अब तो अंतरिक्ष पर्यटन पर जोर बढ़ रहा है। इस दिशा में कई सरकारी व निजी प्रयास हो रहे हैं।

गगनयान मिशन को भी इसी दृष्टि से विकसित किया जा रहा है कि अंतरिक्ष पर्यटन की संभावनाओं को भुनाया जा सके। ऐसे में शुभांशु जैसे अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरत बढ़ेगी। दुनिया के देशों की उन्नति इस बात से भी आंकी जाने लगी है कि अंतरिक्ष में किसकी कितनी पहुंच है और अपने दम पर वह अंतरिक्ष में कितनी जगह बना पाया है। भारत निस्संदेह अंतरिक्ष अनुसंधान की बड़ी ताकतों में शुमार हो चुका है। अपना अंतरिक्ष यात्री भेज कर उसने इस दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है।

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