Hindi vs Tamil Controversy: देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि किसी मसले पर असहमति या विवाद की स्थिति है, तो उसे संवाद और सौहार्द के सहारे हल किया जाए और सहमति की हर संभावना को मजबूत किया जाए। मगर विडंबना यह है कि कई बार कुछ मुद्दों को इस हद तक संवेदनशील स्वरूप दे दिया जाता है कि उसके बाद विवाद नाहक ही जटिल होता चला जाता है।

गौरतलब है कि तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी ने चेन्नई में रविवार को ‘भाषा शहीद दिवस’ मनाया और इस मौके पर राज्य के मुख्यमंत्री स्टालिन ने हिंदी भाषा पर बहस को एक बार फिर हवा दे दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा कि ‘न तब, न अभी, न ही कभी हिंदी को यहां जगह मिलेगी।’

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इस मसले पर अतीत में कैसे मत-विरोध रहे हैं और कैसे यह एक समय हिंसक आंदोलन का कारण बना था, यह जानते हुए भी अगर आज एक बार फिर उसी तेवर में विवाद को तूल दिया जाता है, तो इसे किस रूप में देखा जाएगा? संवाद के बजाय आक्रामकता का सहारा लेकर किस समस्या का स्थायी हल निकाला जा सकता है?

देश की संघीय भावना विविधता के सौंदर्य से ही शक्ति ग्रहण करती है। अलग-अलग भाषाएं इसका एक सबसे अहम हिस्सा हैं। हिंदी को देश को जोड़ने वाली एक भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखा जाता है, तो इसके अपने आधार हैं। मगर इसमें कहीं भी तमिल या देश की किसी भी अन्य भाषा की अहमियत की अनदेखी करने या खुद को उन पर थोपे जाने का आग्रह नहीं है।

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हैरानी की बात यह है कि किसी भाषा को नुकसान पहुंचाए बिना कभी सिर्फ हिंदी पढ़ाने की बात की जाती है, तो उसे थोपने के तौर पर देख लिया जाता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का यही मानना है कि केंद्र सरकार राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश कर रही है। उनकी इस बात से शायद ही किसी को असहमति होगी कि तमिलनाडु अपनी भाषा से जीवनधारा की तरह प्यार करता है।

मगर क्या किसी भी भाषा से प्यार को दूसरी भाषा के खिलाफ संघर्ष या टकराव का कारण बनना चाहिए? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि भाषा के मसले पर इस तरह मोर्चा खोलना किसी भी भाषा का कितना हित सुनिश्चित करेगा! जनसत्ता संपादकीय: लाचार व्यवस्था या संवेदनहीन प्रशासन, ग्रेटर नोएडा में युवराज मेहता की मौत का गुनाहगार कौन?