Bus Accidents in Mountain Areas: केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से सड़क हादसों पर अंकुश लगाने के लिए कई तरह के उपाय लागू किए गए हैं, मगर जमीनी स्तर पर इनके प्रभावी नतीजे नजर नहीं आ रहे हैं। दुर्घटनाओं के आंकड़े कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। पहाड़ी प्रदेशों में तो सड़क हादसों की भयावहता और भी ज्यादा होती है।
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में गुरुवार को एक निजी बस के पांच सौ फुट गहरी खाई में गिर जाने से चौदह लोगों की मौत हो गई और बावन लोग जख्मी हो गए। हैरत की बात यह है कि इस बस में सिर्फ 39 यात्रियों को ही बिठाने की क्षमता थी। जाहिर है कि बस में क्षमता से अधिक यात्री सवार थे।
ऐसे में सवाल है कि क्या हर बार खराब मौसम और सड़कों की भौगोलिक स्थिति को हादसों के लिए जिम्मेदार बता कर आंखें मूंद लेना सही है? इस तरह के हादसों में होने वाली मौत के लिए किसकी जवाबदेही है? क्या सरकार और प्रशासन का दायित्व नहीं है कि यातायात नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
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गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में अधिकतर सड़कें पहाड़ी इलाकों से गुजरती हैं, जो संकरी होने के साथ घुमावदार भी हैं। कई सड़कें तो ढलान वाली हैं। भौगोलिक स्थिति इसे तब और जटिल बना देती है, जब घनी धुंध, बारिश या सड़क पर बर्फ की परत जम जाती है। अगर वाहनों में क्षमता से अधिक यात्री सवार हों, तब भी उनके अनियंत्रित होकर दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा बना रहता है।
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हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में हुए इस हादसे का कारण भी बस में क्षमता से अधिक यात्रियों का सवार होना बताया जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि यात्री वाहनों के औचक निरीक्षण की व्यवस्था को कड़ाई से लागू किया जाए। इसमें दोराय नहीं कि समन्वित प्रयासों से ही सड़क हादसों को रोका जा सकता है। कोई मानवीय भूल न हो, इसके लिए चालकों को भी विशेष प्रशिक्षण और जागरूकता की जरूरत है।
पहाड़ी इलाकों में जाने से पहले वाहनों की तकनीकी जांच कराने का पहलू भी अहम है। अगर हर स्तर पर सतर्कता बरती जाए, तो निश्चित रूप से दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।
