उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में एक बच्ची को घरेलू सहायिका बनाकर रखने तथा उसके साथ मारपीट एवं क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने की घटना न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली है, बल्कि यह समाज में कुछ लोगों की कुंठित और विकृत मानसिकता को भी उजागर करती है। हैरत की बात है कि यह सब सुरक्षा का जिम्मा संभाले सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के रिहाइशी परिसर में हुआ। आरोपी इसी बल का कर्मी है और पुलिस ने उसे और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया है।
कहा जा रहा है कि आरोपी ने घरेलू काम के लिए इस बच्ची को अपने आवास पर रखने की आधिकारिक अनुमति नहीं ली थी। ऐसे में सवाल है कि इस मामले में कार्रवाई करने में इतनी देरी क्यों हुई? क्या आसपास रहने वाले दूसरे कर्मियों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनका कोई सहयोगी एक बच्ची से घर का काम करवाता है और उसके साथ मारपीट करता है?
गौरतलब है कि ग्रेटर नोएडा के सीआरपीएफ परिसर में इस घटना का पता तब चला, जब आरोपी जवान ने अपने आवास पर काम के लिए रखी दस वर्ष की बच्ची को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया। चिकित्सीय जांच में बच्ची के शरीर पर कई जख्म पाए गए और उसमें खून की मात्रा भी बहुत कम पाई गई। पूछताछ में पता चला कि आरोपी और उसकी पत्नी इस बच्ची से अक्सर मारपीट करते थे और कई बार भोजन भी नहीं देते थे। यह जानते हुए कि बाल श्रम कराना अपराध है, इसके बावजूद एक बच्ची को घर पर काम के लिए रखना और उसके साथ मारपीट करना, यह किस तरह की मानसिकता को दर्शाता है।
क्या कुछ लोगों के भीतर कानून का खौफ इस कदर खत्म हो गया है? हालांकि सीआरपीएफ ने विभागीय कार्रवाई के तहत आरोपी जवान को निलंबित कर दिया है, लेकिन पीड़ित बच्ची ने जो यातना झेली है, उसकी भरपाई कैसे संभव हो पाएगी। इस सवाल पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि अगर सुरक्षा बल का कोई जवान ही गैरकानूनी और संवेदनहीन कृत्य में संलिप्त हो, तो आम आदमी खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेगा।
