पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। पुलिस की गोली से एक युवक के मारे जाने के बाद शनिवार को हिंसा भड़क उठी और कई जगहों पर आगजनी की घटनाएं हुईं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने अलग गोरखालैंड की मांग तेज कर दी है। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन संगठनों के नेताओं से बातचीत करने का प्रस्ताव रखा है, पर उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। करीब दो महीने पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी स्कूलों में बांग्ला भाषा पढ़ाने की अनिवार्यता संबंधी आदेश जारी किया था। उसके बाद से ही गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अलग गोरखालैंड की अपनी पुरानी मांग को फिर से दोहराना शुरू कर दिया। दार्जीलिंग इलाके के ज्यादातर लोग चूंकि नेपाली बोलते हैं, इसलिए उनका कहना है कि राज्य सरकार स्कूलों में पढ़ाई के बहाने उन पर बांग्ला भाषा थोपना चाहती है। हालांकि अदालत स्पष्ट कह चुकी है कि भाषा के आधार पर अलग राज्य के गठन की मांग किसी भी रूप में उचित नहीं है। पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अपने आंदोलन को जारी रखा है।
दरअसल, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और सरकार के बीच टकराव की वजह महज बांग्ला भाषा पढ़ाने की अनिवार्यता नहीं है। इसके पीछे बड़ा कारण गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरंग की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा है। सुभाष घीसिंग के साथ हुए समझौते के बाद पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाकों के लिए एक अलग परिषद का गठन कर दिया गया था। उसके बाद करीब बीस साल तक अलग गोरखालैंड की मांग शांत हो गई थी। मगर विमल गुरंग इस मांग को जिंदा रखे हुए थे। जबसे राज्य में ममता बनर्जी की सरकार आई है, गुरंग गोरखालैंड की मांग के साथ कुछ अधिक सक्रिय हो गए हैं। यों गुरंग का जनाधार काफी समय से कमजोर पड़ने लगा था। ममता बनर्जी सरकार ने भी उनके पर कतरने शुरू कर दिए। उसने राई, लेपचा, शेरपा आदि जनजातियों के लिए अलग-अलग विकास बोर्ड बना दिए, जिससे उन्हें वित्तीय मदद सीधा पहुंचने लगी। इससे इन जनजातियों में भी तृणमूल कांग्रेस की पैठ बढ़ी है। हाल के निगम चुनावों में तृणमूल के पार्षद भी जीत कर आए हैं। इस तरह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को लगने लगा है कि उसका जनाधार धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। फिर ममता सरकार ने उन निगम परिषदों में वित्तीय अनियमितताओं की जांच शुरू करा दी है, जिन पर पहले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा काबिज था। जाहिर है, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और उसके सहयोगी दूसरे अलगाववादी दलों को ममता बनर्जी का रवैया रास नहीं आ रहा।
मगर ममता और अलगाववादी संगठनों के इस टकराव का फायदा उठा कर अपना जनाधार मजबूत करने का प्रयास करने वाला तीसरा पक्ष भी अब साफ नजर आने लगा है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। ऐसे में ममता बनर्जी का यह आरोप बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता कि इस आंदोलन को हवा देने वाले दूसरे लोग हैं। भाजपा पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है। मगर इस तरह बंटवारे की मांग को हवा देकर उसे सैद्धांतिक तौर पर शायद ही कुछ हासिल हो। भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे की धारणा पहले से प्रश्नांकित है। विकास के मद्देनजर राज्यों का आकार छोटा रखने का तर्क बेशक वाजिब कहा जा सकता है, पर भाषा के आधार पर बंटवारे की सियासत लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है।

