दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने में उसकी ओर से बिजली मुफ्त मुहैया कराए जाने के वादे ने बड़ी भूमिका निभाई थी। इस मुद्दे पर पार्टी को जनता के एक बड़े हिस्से का समर्थन मिला था। इस पर काफी हद तक अमल भी हुआ, जिसका फायदा दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों को मिला। हालांकि इस मसले पर अनेक सवाल उठे थे कि मुफ्त बिजली की योजना की वजह से राजस्व पर पड़ने वाले बोझ की भरपाई कैसे होगी।

लेकिन बीते कई साल से यह नीति लागू रही। अब अलग-अलग कारणों से इस मामले में जिस तरह की खींचतान शुरू हो गई है, उससे जनता के बीच इस सुविधा के जारी रहने को लेकर स्वाभाविक ही आशंका खड़ी हो गई है। दरअसल, हाल ही में दिल्ली सरकार ने दावा किया कि चूंकि उपराज्यपाल ने फाइल पर हस्ताक्षर करके नहीं भेजा, इसलिए उपभोक्ताओं को बिना सबसिडी वाली बिजली नहीं मिलेगी। एक तरह से दिल्ली सरकार की ऊर्जा मंत्री ने उपराज्यपाल पर यहां के छियालीस लाख परिवारों को मिलने वाली बिजली सबसिडी रोकने का आरोप लगाया।

जाहिर है, इसके बाद यह मसला राजनीतिक खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप में तब्दील हो गया। फाइल रोके जाने की खबर के कुछ समय बाद ही चूंकि उपराज्यपाल की ओर से इसकी मंजूरी मिलने की खबर आ गई थी, इसलिए इस मामले को लेकर आम आदमी पार्टी और भाजपा ने एक-दूसरे पर जनता को सुविधाओं से वंचित करने का आरोप लगाया।

लेकिन अब जिस तरह उपराज्यपाल ने एक पत्र के माध्यम से दिल्ली सरकार के आरोपों को झूठा बताते हुए उसके प्रमाण मांगे हैं और ऐसा न करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है, उससे यही लग रहा है कि इस मसले पर दोनों पक्षों के बीच टकराव फिलहाल खत्म नहीं हुआ है। सवाल है कि सरकार में होने के बावजूद आम आदमी पार्टी के नेता या मंत्री को क्या किसी नीतिगत फैसले की घोषणा, उसकी मंजूरी और उसे लागू करने की प्रक्रिया में लगने वाले समय के बारे में अंदाजा नहीं है! अगर सरकार को ऐसा लगा भी कि बिजली सबसिडी के फैसले पर उपराज्यपाल की मंजूरी में देरी होने के मामले में कोई प्रक्रियागत खामी है, तो क्या इसे सार्वजनिक रूप से राजनीतिक मुद्दा बनाने से पहले स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार नहीं कर लेना चाहिए था?

किसी भी व्यवस्था में लोक-लुभावन सरकारी योजनाओं के साथ एक समस्या यह होती है कि उससे किसी पार्टी को आम लोगों का समर्थन तो मिलता है, मगर एक हद के बाद कोई योजना सरकारी कोष के लिए बोझ भी साबित होने लग सकती है। उसके बाद इस बात पर विचार होने लगता है कि नागरिकों को मुफ्त में दी जा रही किसी सेवा का दायरा क्या कुछ कम या सीमित किया जाए! ऐसे में सरकार की ओर से चलाई जा रही किसी योजना के लाभ या मुफ्त सेवा में कटौती होती है तो उसके लाभार्थियों के बीच असंतोष या नाराजगी पैदा होती है।

सरकार के लिए यही दुविधा का वक्त होता है कि कोई सेवा मुफ्त मुहैया कराने के जिस भरोसे पर उसने लोगों का समर्थन और वोट हासिल किया था, उसे किस रूप में कायम रखे या बंद कर दे। कायदे से सही यह है कि सत्ता में आने के लिए किसी पार्टी या फिर सरकार को जनता से सिर्फ वही वादा करना चाहिए, जिसे बिना किसी बोझ के पूरा किया जा सके। अगर मुफ्त सेवा या सुविधा से राजस्व पर बोझ बढ़ता है और उसकी भरपाई जनता से किसी अन्य तरीके से की जाती है तो उसे किस तरह देखा जाएगा?