एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर नाहक सवाल उठाना उचित नहीं है। इससे शक ही पैदा होता है। अदालत ने ईवीएम संबंधी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। दरअसल, ईवीएम को लेकर आशंका जाहिर की जा रही थी कि उसे बाहर से नियंत्रित किया और मतों में गड़बड़ी की जा सकती है। अदालत के सामने इस पर रोक लगाने की गुहार लगाई गई थी।

इसके पक्ष में कई ऐसे प्रमाण भी दिए गए थे कि कहां-कहां कुल पड़े मतों और मशीनों में पड़े मतों की संख्या में अंतर पाया गया। विपक्षी दल इसे लेकर काफी आक्रामक थे और लगातार आशंका जाहिर कर रहे थे कि सत्तापक्ष मशीनों के जरिए मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसमें कई स्वयंसेवी संगठन और विशेषज्ञ भी शामिल थे, जिनका दावा था कि ईवीएम को बाहर से संचालित किया जा सकता है।

हालांकि भारत निर्वाचन आयोग लगातार तर्क दे रहा था कि ईवीएम सौ फीसद सुरक्षित हैं और उनमें किसी प्रकार की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है। इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया था कि आम मतदाता के भीतर भी यह भ्रम पैदा हो गया कि ईवीएम में गड़बड़ी करके कोई पार्टी अपने पक्ष में मतों की संख्या बढ़ा सकती है।

ईवीएम पर संदेह जाहिर करते हुए अदालत में गुहार लगाने वालों की मांग थी कि मतदान के बाद जो पर्ची कट कर बक्से में गिरती है उसे मतदाता के हाथ में दिया जाए और वह उसे खुद अलग बक्से में डाले। फिर मशीन के साथ ही उन पर्चियों का मिलान कर अंतिम रूप से मतों की गणना की जाए। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उस मांग को खारिज कर दिया। दरअसल, इस तरह मतदान की गोपनीयता का उल्लंघन होने का खतरा था।

मगर इसमें अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि वह मशीनों में चुनाव चिह्न निर्धारित हो जाने के बाद उन्हें सीलबंद कर दे। उसने एक और रास्ता खोल दिया है कि अगर कोई प्रत्याशी किन्हीं मशीनों के बारे में शिकायत दर्ज कराता है, तो विशेषज्ञों से उनकी जांच कराई जाए। उस जांच का सारा खर्च संबंधित प्रत्याशी को उठाना पड़ेगा। इसे बहुत से लोग बड़ी राहत की बात मान रहे हैं। इस तरह गड़बड़ियों की जांच हो सकेगी। पर अब यह तो तय है कि ईवीएम को लेकर जिस तरह के भ्रम बने हुए थे, वे याचिकाकर्ताओं के मन से काफी हद तक दूर हो चुके होंगे।

हालांकि यह पहला मौका नहीं था, जब ईवीएम पर संदेह जताते हुए अदालत में गुहार लगाई गई थी। इसके पहले भी कई मौकों पर इसे चुनौती दी गई थी। पिछले आम चुनाव के वक्त भी इस मसले को काफी तूल दिया गया था। हालांकि निर्वाचन आयोग ने बार-बार मशीन की निर्दोषिता सिद्ध करने की कोशिश की थी, पर उस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था।

अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस पर संदेह की कोई गुंजाईश नहीं रह गई है। राजनीतिक दलों को मशीन पर शक करने के बजाय मतदाताओं पर अधिक भरोसा करने की जरूरत है। मशीन पर शक करने से नाहक मतदाताओं के भीतर भ्रम पैदा हुआ है। हालांकि निर्वाचन आयोग को भी इसे हार-जीत की तरह नहीं लेना चाहिए, उसे ईवीएम को विश्वसनीय बनाए रखने के जो भी उपाय हो सकते हैं, उन्हें अपनाने में उसे गुरेज नहीं होना चाहिए।