बेहतर स्वास्थ्य के लिए उपचार की किफायती और सुलभ सुविधाएं मनुष्य की बुनियादी जरूरत है। इनमें चिकित्सक की उपलब्धता, समय पर सस्ते दामों में दवाएं मुहैया कराना और आपातकालीन देखभाल शामिल हैं, ताकि लोगों का जीवन सुरक्षित रहे। अगर व्यवस्था में इन जरूरी सुविधाओं का अभाव हो, तो विकास के दावों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।
देश की राजधानी दिल्ली की एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई है। दिल्ली सरकार की जन्म और मृत्यु पंजीकरण पर वार्षिक रपट के मुताबिक, वर्ष 2024 में राष्ट्रीय राजधानी में एक लाख उनचालीस हजार से अधिक लोगों की मौत हुई, जिनमें से 34.84 फीसद लोगों की मौत घर पर ही हुई। सवाल है कि आज के दौर में जब लोग मामूली तकलीफ होने पर भी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों का रुख करते हैं, तो ऐसी क्या वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में मौत घर पर ही हो जाती है? जाहिर है, इसके पीछे स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और आपात स्थिति में चिकित्सा सहायता समय पर न मिलना भी एक बड़ा कारण हो सकता है।
इस बात पर गौर करना जरूरी है कि आने वाले दिनों में भारत के दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाने के दावों के बीच अगर चिकित्सा सहायता न मिलने से लोगों की जान जा रही है, तो यह पूरी व्यवस्था पर सवाल है। हैरत की बात है कि आधुनिक चिकित्सा सेवाओं का दम भरने वाली दिल्ली के लोग स्वास्थ्य को लेकर आपात परिस्थिति में खुद को असहाय महसूस करते हैं।
यह अक्सर देखने में आता है कि अगर कहीं सड़क पर दुर्घटना हो जाए या फिर घर पर किसी व्यक्ति की तबीयत ज्यादा बिगड़ जाए, तो एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती है। प्राथमिक उपचार के इंतजार में कई बार मरीज की जान चली जाती है।
ऐसी खबरें भी आती रहती हैं कि किसी मरीज को अस्पताल में बिस्तर खाली नहीं होने की वजह से भर्ती नहीं किया गया, घर वापस आने पर उसकी मौत हो गई। हालांकि, कुछ मामलों में लोगों में जागरूकता की कमी भी एक कारण हो सकता है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं में बरती जाने वाली लापरवाही के लिए संबंधित कर्मियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
