निजी मुकदमे का खर्च सरकारी खजाने से भुगतान कराने की कोशिशों का पर्दाफाश होने पर आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की एक बार फिर जमकर जगहंसाई हुई है। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और ईमानदारी की दुहाई देकर दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई ‘आप’ की छीजती छवि इस घटना के बाद और भी कमजोर हुई है। हालांकि पार्टी के नेता इस मामले में कई तरह की तकनीकी दलीलें लेकर सामने आए हैं, लेकिन ये दलीलें नकली बचाव ही सिद्ध हो रही हैं। सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, नीयत का भी है। उपराज्यपाल को अंधेरे में रख कर भुगतान कराने की कोशिश अगर कामयाब हो जाती तो?
गौरतलब है कि केजरीवाल ने भाजपा नेता और केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली पर डीडीसीए (दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन ) का अध्यक्ष रहने के दौरान घपला करने का आरोप लगाया था। जेटली ने इसे अपनी मानहानि मानते हुए अदालत में दस करोड़ रुपए हर्जाने का मुकदमा दायर कर रखा है। केजरीवाल की तरफ से मशहूर वकील राम जेठमलानी पैरवी कर रहे हैं। हुआ यों कि जेठमलानी ने अपनी फीस वसूली के लिए दिसंबर 2016 में करीब 3.8 करोड़ रुपए का बिल केजरीवाल के पास भेजा था, जिसमें एक करोड़ रुपए रिटेनर फीस तथा 22 लाख रुपए प्रति सुनवाई का जिक्र था। विवाद का बिंदु यही बिल है। इस बिल के भुगतान के संबंध में दिल्ली सरकार के विधि मंत्रालय ने अपनी सलाह में कहा कि इस पर केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय और उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी है।
बहरहाल, उपराज्यपाल ने कानूनी राय ली तो इसमें यह बात साफ हुई कि यह मुकदमा ‘व्यक्ति’ पर हुआ है, न कि ‘मुख्यमंत्री’ पर। मंगलवार को जैसे ही यह मामला मीडिया में उछला तो प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। भाजपा ने केजरीवाल पर सार्वजनिक धन की ‘लूट और डकैती’ करने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया कि निजी मामले में भुगतान करदाताओं के धन से कैसे किया जा सकता है? उधर, आम आदमी पार्टी की ओर से कहा गया कि केजरीवाल ने जो भी आरोप लगाए थे, वह सार्वजनिक हित में और सार्वजनिक पद पर रहते हुए लगाए थे। इसलिए इसमें कुछ भी निजी नहीं है। इस बीच जेठमलानी ने कहा कि वे यह मुकदमा मुफ्त में लड़ने को तैयार हैं, क्योंकि केजरीवाल उनके गरीब मुवक्किल हैं और वे ऐसे लोगों के लिए मुफ्त सेवाएं पहले भी देते रहे हैं।
लेकिन अगर जेठमलानी को मुफ्त सेवा देनी थी तो इतना लंबा-चौड़ा बिल क्यों भेजा था? पिछले महीने नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में 29 करोड़ रुपए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तयमानकों के विरुद्ध विज्ञापन पर खर्च करने की बात कही थी। इस बारे में उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को वसूली करने का आदेश भी जारी कर चुके हैं। इसके बाद अब इस नए खुलासे के चलते आप की साख को और चोट पहुंची है। आम आदमी पार्टी हाइकमान संस्कृति को खत्म करने और सत्ता के दुरुपयोग को बंद करने के वादे पर वजूद में आई थी। विडंबना यह है कि खुद अपनी ही कसौटियों पर आज वह कठघरे में खड़ी दिखती है।

