राज्यसभा इस सरकार के लिए बहुत बार परेशानी का सबब रही है। लेकिन सोमवार को राज्यसभा में सरकार की किरकिरी अपने ही लोगों के कारण हुई है। 123वें सविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा और मतदान के समय सत्तापक्ष की उपस्थिति बहुत कम थी। लिहाजा, विधेयक पर विपक्ष के चार संशोधन मंजूर कर लिये गए, जो सरकार को कतई स्वीकार्य नहीं हैं। इस संविधान संशोधन विधेयक का मकसद राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देना है, जैसा कि अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग और अल्पसंख्यक आयोग को हासिल है। यों तो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना 1993 में ही हो गई थी, पर इसे सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियों को पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने या पहले से सूची में सम्मिलित जातियों में से किसी को बाहर करने की सिफारिश करने से ज्यादा कुछ अधिकार नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका सिर्फ उपर्युक्त सिफारिश तक सीमित न रहे। वे इस आयोग को सशक्त बनाना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने इसे संवैधानिक दर्जा देने की पहल की। लोकसभा संबंधित विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है। पर विधेयक राज्यसभा में आया तो उसने इसे सदन की प्रवर समिति के पास भेज दिया। प्रवर समिति की रिपोर्ट आने के बाद विधेयक फिर राज्यसभा में पेश किया गया।
पर इस बार सदन में सत्तापक्ष के अधिकतर सदस्य अनुपस्थित थे। नतीजतन विपक्ष ने अपने चार संशोधन मंजूर करा लिये। इन संशोधनों का लब्बोलुआब यह है कि आयोग पांच सदस्यीय हो, जिनमें से एक सीट महिला और एक सीट अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधि के लिए आरक्षित हो। जबकि मूल विधेयक में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष सहित तीन सदस्यीय आयोग का प्रस्ताव था। बहस में हिस्सा लेते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने विपक्ष के प्रस्तावों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग अलग से विशेष उद््देश्य के लिए मौजूद हैं, तो प्रस्तावित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग में एक सीट महिला और एक सीट अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधि के लिए आरक्षित करने की मांग का क्या औचित्य है? बहरहाल, विपक्ष की तरफ से लाए गए संशोधन बावन के मुकाबले चौहत्तर मतों से पास हो गए। हालांकि इन संशोधनों की वैधता पर सवालिया निशान लगा हुआ है, क्योंकि संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण विधेयक पारित करने के अलावा संशोधन मंजूर कराने के लिए भी दो तिहाई मत होने चाहिए।
खैर, इन संशोधनों के बाद विधेयक का स्वरूप बदल गया है, जिसे लोकसभा की मंजूरी हासिल नहीं है। लिहाजा, सरकार को विधेयक को संसद की स्वीकृति दिलाने की कवायद नए सिरे से करनी पड़ेगी। पर सरकार के लिए इससे भी चिंता की बात शायद है कि सत्तापक्ष के सदस्यों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण यह नौबत आई। प्रधानमंत्री पहले भी कई बार सदन से भाजपा सांसदों के गैरहाजिर रहने पर चेता चुके थे। पर लगता है कि उनकी चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ। अब उन्होंने और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने सख्ती के संकेत दिए हैं। क्या यह उम्मीद की जाए कि आगे कभी यह नौबत नहीं आएगी? आमतौर पर सत्तापक्ष सदन की कार्यवाही को गंभीरता से न लेने का आरोप विपक्ष पर मढ़ता रहता है। मगर ताजा संशोधन विधेयक का जो हश्र राज्यसभा में हुआ उससे तो सत्तापक्ष के सांसदों की बाबत ही यह सवाल उठा है कि वे संसद के कामकाज में कितनी दिलचस्पी लेते हैं!
