शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ स्कूलों में विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था, पेयजल, शौचालय और खेल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाओं का होना बेहद जरूरी है। ये सुविधाएं एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बनाती हैं, जो विद्यार्थियों को अच्छे से पढ़ाई करने में सहायक होता है। स्कूलों में इस व्यवस्था का अभाव न केवल पठन-पाठन को प्रभावित करता है, बल्कि छात्रों खासकर लड़कियों के पढ़ाई बीच में छोड़ने का कारण भी बनता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी स्तर पर स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं मुहैया कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया है, लेकिन वस्तुस्थिति आज भी संतोषजक नहीं है।

हाल में असम से आई एक खबर ने चिंता पैदा कर दी है कि राज्य के चार क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों में एक हजार चार सौ सरकारी स्कूलों में पेयजल एवं शौचालय की सुविधा नहीं हैं। साथ ही अट्ठाईस हजार शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं। प्रदेश सरकार ने विधानसभा में यह जानकारी दी है। असम के मुख्यमंत्री अपने भाषणों में राज्य को अगले पांच वर्षों में एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने और समग्र विकास करने के दावे करते हैं। मगर हकीकत यह है कि वहां के बहुत सारे स्कूलों का बुनियादी ढांचा अभाव और बदहाली का शिकार है।

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देश भर में स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए सरकार ने मध्याह्न भोजन योजना लागू की है। मगर बच्चों को व्यापक स्तर पर शिक्षा से जोड़ने के लिए क्या नामांकन बढ़ाना ही काफी है? क्या इसके लिए स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का होना जरूरी नहीं है? ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर शासन और प्रशासन के स्तर पर विचार तो किया गया, योजनाएं-परियोजनाएं भी बनीं, लेकिन धरातल पर उनका नतीजा लक्ष्य से काफी पीछे नजर आ रहा है।

केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष नवंबर में एक मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र दायर कर बताया था कि देश में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों सहित 97.5 फीसद से अधिक स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय की सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। मगर सिर्फ ढांचा खड़ा कर देना ही सुविधा नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसका बेहतर रखरखाव हो, ताकि विद्यार्थी उस सुविधा को सुलभ और निर्बाध रूप से इस्तेमाल कर सकें।