देश में अवैध और अवैज्ञानिक तरीके से खनन तथा इसके पर्यावरण पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। ये तर्क सही हो सकते हैं कि खनन गतिविधियां विकास प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन क्या पर्यावरण की कीमत पर विकास की राह तलाशना उचित है? पिछले कुछ दिनों से चर्चा में रहे अरावली पर्वत-शृंखला के मसले को लेकर यह बहस जोर पकड़ रही है कि अगर कोई प्राकृतिक संरचना किसी क्षेत्र के लिए जीवन-धारा और सुरक्षा दीवार के रूप में खड़ी है, तो क्या उसका संरक्षण जरूरी नहीं है!
हाल के वर्षों में अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियां बढ़ी हैं और इससे होने वाले नुकसान को लेकर उठी आवाज की अनदेखी हुई है। यही वजह है कि बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया कि अरावली में खनन और इससे संबंधित मुद्दों की व्यापक एवं समग्र जांच जरूरी है तथा इसके लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाएगी। साथ ही इस बात पर जोर दिया कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो सकती है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि आसपास की जमीन से कम से कम सौ मीटर ऊंचे हिस्से को ही अरावली पहाड़ी के तौर पर माना जाएगा। अदालत की इस नई परिभाषा के बाद यह आशंका पैदा हो गई थी कि अगर सौ मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों पर खनन, निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों के रास्ते खुलेंगे, तो इसके बाद समूचे इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव पड़ सकते हैं।
क्योंकि, पहाड़ियों के बीच पांच सौ मीटर की दूरी के मानक से अरावली का बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण से बाहर हो सकता था। हालांकि, बाद में शीर्ष अदालत ने अपने इस फैसले को स्थगित करते हुए कहा था कि इस मामले में कुछ गंभीर अस्पष्टताओं का समाधान जरूरी है। अब न्यायालय ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर खनन क्षेत्र के विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों के नाम सुझाने का निर्देश दिया है, ताकि विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सके।
मगर यह पहलू भी महत्त्वपूर्ण है कि विशेषज्ञों की समिति बिना किसी दबाव और निष्पक्षता से अध्ययन कर अपने सुझाव सामने रखे। इस चिंता को दूर करने के लिए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि यह समिति उसके निर्देशन और निगरानी में कार्य करेगी।
दरअसल, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात से लेकर दिल्ली तक के सैकड़ों किलोमीटर इलाके में फैली अरावली पर्वत-शृंखला को उत्तर भारत में पर्यावरण को संतुलित रखने की लिहाज से एक प्राकृतिक दीवार के रूप में देखा जाता है। मगर पिछले कुछ वर्षों से अरावली क्षेत्र में जिस तरह पत्थर, रेत और अन्य संसाधनों की पूर्ति के लिए खनन गतिविधियां बढ़ी हैं, उससे इलाके के पर्यावरण पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली के आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर को सामान्य बनाए रखने, रेगिस्तान बनने से रोकने और लोगों की आजीविका बचाने के लिए इसका संरक्षण जरूरी है। इसे न केवल पर्यावरणीय, बल्कि भूगर्भीय और जलवायु संबंधी महत्त्व की दृष्टि से भी देखने और मूल्यांकन करने की जरूरत है। अगर अरावली की पहाड़ियों में अवैध और अवैज्ञानिक तरीके से खनन पर रोक नहीं लगाई गई, तो निश्चित रूप से निकट भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
