हालांकि पहले से ही यह आम धारणा थी कि अगर कांग्रेस को पंजाब में सरकार बनाने का मौका मिलेगा, तो मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद अमरिंदर सिंह ही होंगे। ऐसे में, जब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मजीठा में रैली को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की तरफ से अमरिंदर सिंह के नाम की घोषणा की, तो शायद ही किसी को हैरानी हुई हो। दरअसल, यह घोषणा एक औपचारिकता ही थी। पर कांग्रेस की रणनीति के लिहाज से यह एलान काफी अहम था। पंजाब का चुनाव तिकोना है। एक तरफ अकाली दल-भाजपा का गठबंधन है, जो राज्य में दस साल से लगातार सत्तासीन रहा है, और दूसरी तरफ कांग्रेस है तथा तीसरी तरफ आम आदमी पार्टी है, जो पिछले लोकसभा चुनाव से राज्य में एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है। लेकिन आम आदमी पार्टी ने मुख्यमंत्री पद की बाबत अपने पत्ते नहीं खोले हैं। इसके पीछे कोई नीतिगत कारण नहीं है। दिल्ली में पार्टी अरविंद केजरीवाल के नाम पर चुनाव लड़ी थी और गोवा में भी उसने मुख्यमंत्री पद का अपना प्रत्याशी घोषित कर रखा है। पंजाब में उसने ऐसा नहीं किया, तो इसके पीछे यही वजह होगी कि यहां उसके पास कोई ऐसी दमदार शख्सियत नहीं है जिसे केंद्र में रख कर चुनाव लड़ने में फायदा नजर आए।

एक बार मनीष सिसोदिया ने केजरीवाल का नाम उछाला जरूर, पर उलटी प्रतिक्रिया या पंजाबी बनाम बाहरी का मुद््दा खड़ा होने के डर से इस मामले में आम आदमी पार्टी खामोश हो गई। कांग्रेस आप की इसी कमजोरी का लाभ उठाना चाहती है। इसलिए अपने नाम पर पार्टी की मुहर लगने के कुछ ही घंटे बाद एक रैली में बोलते हुए अमरिंदर सिंह ने आम आदमी पार्टी को मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद बताने की चुनौती दी। इसमें दो राय नहीं कि पंजाब में कांग्रेस के पास अमरिंदर सिंह जैसा कद््दावर नेता कोई दूसरा नहीं है। वे मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी है और सांगठनिक क्षमता भी। लेकिन बादल सरकार के प्रति असंतोष और अमरिंदर सिंह की जानी-पहचानी शख्सियत के बावजूद कांग्रेस की राह निष्कंटक नहीं है। जिस दिन अमरिंदर सिंह के नाम की घोषणा राहुल गांधी ने की, उसी दिन अमरिंदर सिंह के गढ़ पटियाला में प्रभावी रोडशो करके केजरीवाल ने चुनौती का अहसास करा दिया।

यह दिलचस्प है कि एक समय पंजाब में राहुल गांधी की पसंद प्रताप सिंह बाजवा थे, जो अमरिंदर सिंह को कतई नहीं सुहाते। तब बाजवा को मिली अहमियत से अमरिंदर इतने खफा थे कि कांग्रेस छोड़ कर उनके अलग दल बनाने की अटकल लगाई जाने लगी थी। पर लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को अमरिंदर सिंह के महत्त्व का फिर से अहसास हुआ और पार्टी-नेतृत्व ने उनसे लोकसभा की अमृतसर सीट पर भाजपा के दिग्गज अरुण जेटली का मुकाबला करने को कहा। जेटली के पीछे अकाली दल की भी ताकत थी, और मोदी लहर भी। फिर भी अमरिंदर के सामने जेटली को मुंह की खानी पड़ी। मतदान से कोई हफ्ता भर पहले कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित कर जता दिया कि उसका सबसे बड़ा दांव क्या है। इससे पार्टी को क्या लाभ होगा, यह तो बाद में पता चलेगा। पर उसके इस दांव से जाहिर है कि अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस के ऐसे क्षत्रप हैं जिनका कोई विकल्प पार्टी के पास फिलहाल नहीं है।