यह विचित्र विडंबना है कि एक ओर बड़ी संख्या में दंपति बच्चों को गोद लेने के लिए बरसों इंतजार करते हैं, तो दूसरी ओर ऐसे अनाथ बच्चे भी हैं, जो उम्र बढ़ने के साथ गोद लिए जाने से वंचित रह जाते हैं। केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि गोद लेने के मामले में समाज का नजरिया किस कदर संकुचित है। इस समय प्राधिकरण के पास ऐसे कई बच्चे हैं, जिनकी उम्र छह वर्ष या इससे अधिक हो गई है।
यह दुखद है कि कई दंपति बच्चा तो गोद लेना चाहते हैं, लेकिन साथ ही उम्र सीमा भी तय कर देते हैं। आज भी लोग नवजात शिशु अथवा पांच साल तक के बच्चों को ही गोद लेना पसंद करते हैं। सवाल है कि संतान सुख पाने के लिए क्या यह नजरिया सही है? उम्र और रंग-रूप के आधार पर बच्चों में भेदभाव करने की प्रवृत्ति को स्वस्थ सोच कहा जा सकता है?
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गौरतलब है कि गोद लेने की प्रक्रिया के साथ प्रतीक्षा सूची लंबी होने का खमियाजा बच्चों को ही भुगतना पड़ता है। कई बार दंपति की जटिल शर्तों से उनकी उपेक्षा ही होती है। इस जद्दोजहद के बीच कई बच्चे पांच-छह साल की उम्र पार कर जाते हैं और उनके गोद लिए जाने की उम्मीद धुंधली होती जाती है। अगर निसंतान दंपति अपनी सामाजिक सोच बदलें, तो बड़ी उम्र के बच्चों को भी परिवार मिल सकता है और उनका भविष्य संवर सकता है।
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वैसे भी बड़े बच्चे समझदार होते हैं और धीरे-धीरे माता-पिता से जुड़ाव के साथ नए परिवार में भी घुल-मिल जाते हैं। अगर दंपति धैर्य रखें और ऐसे बच्चों को प्यार एवं प्रोत्साहन दें, तो यह उनके लिए भी सुखद होगा। निस्संदेह हर बच्चे का अपना घर-परिवार होना चाहिए। इसलिए सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी है, ताकि अनाथ बच्चों को भी सामान्य बच्चों की तरह खुशहाल जिंदगी मिल सके और वे अपने सपनों को पूरा कर सकें।
परिवार में शामिल होने पर अनाथ बच्चे खुद को मूल्यवान महसूस करते हैं व इससे न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, बल्कि वे समाज में सम्मान के भी हकदार होते हैं।
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