तकरीबन बारह साल पहले दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपियों का अदालत से बरी होना यही साबित करता है कि पुलिस की कार्यप्रणाली के चलते कितने स्तरों पर लोगों को निराशा और यातना भुगतनी पड़ती है। अव्वल तो देश की राजधानी होने के नाते सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से सबसे संवेदनशील होने के बावजूद दिल्ली में बम धमाकों को अंजाम देने वाले कामयाब हुए, फिर इस मामले में पकड़े गए लोगों के बारे में यह साबित नहीं किया जा सका कि वारदात के लिए वही जिम्मेवार थे। क्या यह पुलिस के काम करने के तौर-तरीके पर एक और सवालिया निशान नहीं है? आतंकी घटना के बाद अपनी सक्रियता का सबूत देने के लिए आनन-फानन में कुछ लोगों को गिरफ्तार करके वह तात्कालिक तौर पर जन-सामान्य के बीच पैदा हुए गुस्से को तो शांत करने की कवायद करती है, लेकिन कई बार अपनी कार्रवाई को वह विश्वसनीय साबित नहीं कर पाती है। यह अपने आप में हैरानी की बात है कि जिन लोगों को दिल्ली में हुए बम धमाकों का अपराधी बता कर गिरफ्तार किया गया, उन पर लगाए गए आरोपों को लगभग बारह साल तक चली अदालती कार्यवाही के बावजूद साबित नहीं किया जा सका।

गौरतलब है कि उनतीस अक्तूबर 2005 को दिवाली के एक दिन पहले सरोजिनी नगर, पहाड़गंज और कालकाजी के भीड़ वाले इलाकों में हुए कई धमाकों में सड़सठ लोग मारे गए थे और सवा दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। उस मामले में मुख्य आरोपी मोहम्मद रफीक शाह और मोहम्मद हुसैन फाजिली सहित तारिक अहमद डार को गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया जा सका। नतीजतन, पटियाला हाउस अदालत ने गुरुवार को इस मामले में फैसला देते हुए किसी भी आरोपी को विस्फोट का दोषी नहीं माना और उन्हें बरी करने के आदेश दिए। जिसे धमाकों का मास्टरमाइंड बताया गया, उस तारिक अहमद डार को सिर्फ एक आतंकवादी समूह से ताल्लुक रखने का दोषी पाया गया और उसे दस साल की सजा सुनाई गई। लेकिन चूंकि वह पहले ही बारह साल जेल में गुजार चुका है, इसलिए वह भी रिहा हो गया। सवाल है कि दिल्ली पुलिस ने इन सभी लोगों को किस बुनियाद पर गिरफ्तार किया था? सारी जांच और पूछताछ से उसने क्या हासिल क्या?

पिछले कुछ सालों के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें उन युवाओं को अदालतों में आखिर निर्दोष पाया गया, जिन्हें पुलिस ने आतंकी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था। अगर कोई युवा इतने संगीन आरोपों में दस-बारह साल या इससे ज्यादा तक जेल में रह कर बाहर आता है तो क्या उसका जीवन पहले की तरह ही सहज रह पाता है? रिहा होने के बाद, बिना किसी अपराध के, इतने बरस कैद रहने से पैदा हुई कुंठा व निराशा अदालत में इंसाफ मिलने से कम हो सकती है? उम्र का एक लंबा दौर जेल में ही गुजर जाने की भरपाई क्या इतनी आसान होती है? इसके अलावा, एक गंभीर आरोप में सालों जेल में बंद रहने से बनी छवि के साथ उसकी सामाजिक जिंदगी वापस पटरी पर आना बहुत मुश्किल होता है। एक सवाल यह भी उठता है कि अगर रिहा हुए ये लोग निर्दोष थे, तो असली दोषी कौन थे और उन तक कानून के हाथ क्यों नहीं पहुंचे!